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शुक्रवार, अक्तूबर 23, 2009

कौन होगा काबिज हरियाणा के सिंहासन पर?

अभी-अभी विशेष--


जैसे आसार थे नतीजे बिल्कुल वैसे ही सामने आए और सिंहासन का खेल उलझ गया। कौन बनेगा हरियाणा का मुख्यमंत्री, कौन सी पार्टी संभालेगी सत्ता और कौन किसके साथ जाएगा? नतीजे सामने आए तो स्वीप-स्वीप की दुहाई देने वाली कांग्रेस पूर्ण बहुमत भी प्राप्त करने की स्थिति में नहीं रही। पूरे चुनाव में शोर मचा रहा कि विपक्ष बिखरा है और किसी का किसी से गठबंधन नहीं। ऐसे में कांग्रेस कुछ ज्यादा ही आश्वस्त थी। दोपहर 12 बजे तक चुनाव नतीजे स्पष्ट कर गए थे कि सब कुछ अस्पष्ट सा होने जा रहा है। सत्ता की चाबी कहीं और ही घूमनी शुरू हो गई। कांग्रेस को मिली 40 सीटें, इनेलो-अकाली दल को मिली 32 सीटें, भाजपा चार पर आकर अटक गई तो हजकां छह सीटें हासिल कर ली। बसपा तो एक पर ही सिमट गई और रह गए निर्दलीय विधायक, जो तादाद में सात हैं। अब सरकार बनाने के समीकरण बैठें तो कैसे बैठें? शाम तक सभी कांग्रेसी दिग्गज और हजकां सुप्रीमो कुलदीप बिश्नोई दिल्ली जा पहुंचे। बातचीत सभी की सभी से चल रही है। कांग्रेसी तो पहले पहुंचे सोनिया दरबार में। स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए हाईकमान के सामने अपने ही कांग्रेसी साथियों ने परेशानी तो शुरू करनी ही थी। चर्चा है कि हाईकमान के सामने बहुत कुछ खुलकर बोला-कहा गया। हाईकमान खुश भी नहीं है। विपक्ष को इतना कम आंकना हुड्डा के लिए सुखद नहीं रहा। फिर कांग्रेस में दावेदारों की कमी भी कहां है। दावा भी ठोकते रहेंगे और अपने आपको दावेदार कहने से गुरेज भी करते रहेंगे। लेकिन बात तो फिर वहीं आकर अटक गई। हाईकमान के मानने से भी क्या होगा, बात तो आंकड़े की है। 40 को 46 बनाने के लिए चाबी तो किसी को देनी पड़ेगी। तो हजकां के कुलदीप बिश्नोई के छह विधायक कांग्रेस को भी चाहिए, और निर्दलियों को काबू में किए हुए इनेलो को भी क्योंकि आंकड़ा पूरा करने के लिए और विधायक चाहिए ही। कांग्रेस के सामने अब झारखंड के चुनाव भी हैं। यहां पिटती है तो असर तो दूसरे राज्यों के चुनाव पर पड़ेगा ही। ऐसे में शर्तो का खेल तो कांग्रेस को मानना ही पड़ेगा और जिसके पास चाबी है, वह पहले मांग भी तो बड़ी ही रखेगा। जो राजनीतिक हालात आज हरियाणा में बने हैं ऐसे में अपने राजनीतिक भविष्य के लिए हजकां सुप्रीमो को बहुत सोच-समझकर फैसला लेना होगा। कांग्रेस ने भजनलाल जैसे कद्दावर नेता को, जिसने कभी 67 सीटें लाकर कांग्रेस की झोली में सत्ता डाली थी, दरकिनार कर दिया था। भजनलाल ने उम्र के इस पड़ाव में हरियाणा जनहित कांग्रेस बनाई जिसे उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने अस्तित्व दिया। हालांकि हजकां केवल छह सीटें लाई है लेकिन हालात ऐसे हैं कि आज हजकां सत्ता पर काबिज होने के लिए दोनों बड़े दलों की जरूरत है। फिलहाल तो सत्ता का मामला दोनों दलों कांग्रेस व इनेलो में फंसा हुआ है। बात इनेलो की करें तो चुनाव में सबसे असरदार कारगुजारी रही है उसकी। जब हर कोई इनेलो को नजरअंदाज कर रहा था और उस पर दांव तक लगाने को तैयार नहीं था, तब इनेलो अंदरखाते अपनी तैयारी में जुटी थी। किसी राष्ट्रीय नेता को चुनाव प्रचार के लिए बुलाए बिना इनेलो ने अपनी साख के सहारे तिहाई से ज्यादा सीटें हथिया लीं। यह करिश्मा पार्टी ने ओमप्रकाश चौटाला, अजय व अभय चौटाला के नेतृत्व में किया है। खास बात यह भी है कि चौटाला दो सीटों से चुनाव लड़े और दोनों पर ही जीते। फिलहाल जोड़-तोड़ का दौर तेज है। विपक्ष के पास 50 सीटें तो हैं मगर वह बिखरी हुई हैं। मिलकर सरकार बनाने का तजुर्बा कामयाब रहेगा, इसमें संदेह है लेकिन इतना तय है कि सरकार बनाने के लिए पूरा मोल-भाव छोटे दल व निर्दलीय विधायक कर रहे हैं। सरकार किसी भी दल की बने मगर इतना तय है कि इस बार फिर सरकार में एक उपमुख्यमंत्री होगा।

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