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बुधवार, नवंबर 18, 2009

ड्राइवर को सूली चढ़ा बच निकलते हैं सभी

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं के लिए व्यक्तियों को सूली पर चढ़ाने की परंपरा है, जबकि विभागीय संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से साफ बच निकलती हैं। भारत में सालाना करीब एक लाख 40 हजार सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। इनमें 90 प्रतिशत मामलों में ड्राइवर को दोषी माना जाता है लापरवाही से गाड़ी चलाने का मुकदमा चलता है। सिर्फ आठ प्रतिशत मामलों में वाहन मालिकों को कसूरवार ठहराया जाता है। दो फीसदी दुर्घटनाओं में ही पीडब्लूडी, ट्रैफिक पुलिस या आरटीओ की जिम्मेदारी तय होती है। ऐसे मामले अपवाद ही हैं जहां गढ्डेदार सड़क, गलत मोड़, बेढब ढलान, बेवजह स्पीड बे्रकर, मिट्टी-रोड़ी-बजरी जैसे बेजा अवरोध, गलत या अनुपस्थित यातायात संकेतक अथवा त्रुटिपूर्ण यातायात व्यवस्था और इनसे जुड़े विभागों को दुर्घटना के लिए जिम्मेदार माना गया हो, जबकि पचास प्रतिशत दुर्घटनाओं में इन की प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका होती है। यहां तक कि वाहन में निर्माणगत खराबी भी दुर्घटना का कारण हो सकती है, जिसके लिए वाहन निर्माता की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए लेकिन भारत में कानूनी प्रावधान होते हुए भी ज्यादातर विभाग दुर्घटना की जिम्मेदारी से साफ बच निकलते हैं। मोटर वाहन एक्ट, 1988 की धारा 135 में बाकायदा इस बात की व्यवस्था है कि प्रत्येक दुर्घटना की राज्य सरकार द्वारा विधिवत जांच एवं विश्लेषण होना चाहिए ताकि हादसे के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों तथा एजेंसियों की जिम्मेदार तय की जा सके। परंतु इस नियम की शायद ही कोई परवाह की जाती है। नतीजतन कई मर्तबा बेगुनाहों को सजा हो जाती है, जबकि असली गुनहगार छूट जाते हैं और दुर्घटनाओं को बढ़ाते रहते हैं। किसका है कसूर : सड़क हादसों के लिए दूसरे कारक किस तरह जिम्मेदार हो सकते हैं, इसे समझने के लिए मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे पर 1995 के दौरान हुए हादसों की जांच पर निगाह डालना उचित रहेगा। उस समय यह एक्सप्रेस-वे नया-नया बना था और इस पर एक के बाद एक दुर्घटनाएं हो रही थीं। जब गहन जांच हुई तो पाया गया कि दुर्घटनाएं टायरों की वजह से हो रही थीं जिन्हें एक्सप्रेस-वे जैसी परिस्थितियां झेलने के लिए नहीं बनाया गया था। इसके बाद वहां ट्रकों के लिए रफ्तार सीमा तय कर दी गई, जिससे दुर्घटनाएं थम गई। दूसरा उदाहरण दिल्ली-गुड़गांव और नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे का है। अब तक जिम्मेदार एजेंसियों ने इनके कारणों की समुचित जांच नहीं की है। इन दोनों एक्सप्रेस-वे के डिजाइन में गंभीर खामियां हैं जिससे गलत जगहों पर निकासी और प्रवेश के रास्ते दे दिए गए हैं। इसके अलावा दूसरी गड़बड़ी गलत-अस्पष्ट-छोटे एवं भ्रामक यातायात संकेतक तथा प्रकाश की अपर्याप्त व्यवस्था की है।

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