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शुक्रवार, नवंबर 27, 2009

रब्बियों के डेरे पर पहुंची कूटनीति और राजनीति


मुंबई, कार्यक्रम तो नरीमन हाउस में रक्तपात की याद करने भर के लिए था मगर यह छोटा सा कार्यक्रम मंुबई में आयोजित बड़े सरकारी कार्यक्रमों के बीच खासा बड़ा हो गया। विदेश राज्य मंत्री शशि थरुर यहां पहुंचे और पाकिस्तान पर निशाना साधा। महाराष्ट्र सरकार की तिकड़ी चव्हाण, भुजबल, पाटिल ने यहां हाजिरी लगाई, इजरायल उच्चायुक्त भी कार्यक्रम में मौजूद रहे। यानी कि कूटनीति और राजनीति दोनों एक छोटे से कार्यक्रम में आ जुटीं, जहां यहूदियों के अलावा अन्य समुदायों के लोग कम ही थे। मामला संदेश देने का था और जब नेता संदेश दे रहे हों तो युवा रब्बियों को जोश आ गया और उन्होंने भी इजरायल की याद के गीत गाए। ..मगर संगीत, रोशनी, राजनीति और कूटनीति सब मिलकर रब्बियों के इस डेरे की उदासी नहीं तोड़ पाए। बाहर संकरी सी गली में हो रहे आयोजन में बहुत कुछ कहा सुना जा रहा था मगर नरीमन हाउस के भीतर एक नीम उदासी थी। यह मुंबई में हमले के शिकार केंद्रों में शायद एकमात्र ऐसा केंद्र है जहां सब कुछ जस का तस है, खून के छींटे भी। कभी रब्बियों के संगीत से गुलजार इस खबाद हाउस में पिछले एक साल के दौरान कोई भूला भटका रब्बी आकर श्रद्धांजलि दे जाता है। नहीं तो यह पूजा के दिनों में ही खुलता है। यहां रब्बी गैब्रियल होल्त्सबर्ग और उनकी पत्‍‌नी रिविका की यादें हर जगह बिखरी हैं। इसी नरीमन हाउस के सामने गुरुवार को कूटनीति भी जुटी। छोटे से यहूदी समुदाय को उनकी कूटनीतिक अहमियत का अहसास कराने और दुनिया को संकेत देने यहां पहुंचे शशि थरुर बोले कि पाकिस्तान ने अब तक जो किया वह पर्याप्त नहीं है। पाकिस्तान को अपनी जमीन से आतंक को समाप्त करना होगा। थरुर ने लगे हाथ यहूदियों से अपने राज्य केरल के एतिहासिक रिश्ते भी याद किए और कहा कि नरीमन हाउस पर आतंक का हमला दरअसल सिर्फ भारत पर हमला नहीं बल्कि आतंक की अंतर्राष्ट्रीय घटना है। थरुर का आना और उनका निशाना साफ था कि यहूदियों का परंपरावादी और दार्शनिक खबाद समुदाय भारत के लिए कूटनीतिक तौर पर अहम है। इजरायल के उच्चायुक्त मार्क सोफर ने भारतीय सुरक्षा बलों की वीरता की तारीफ और भारत में यहूदियों को मिले सम्मान का जिक्र करते हुए श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम खत्म होते होते मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, उप मुख्यमंत्री छगन भुजबल और गृह मंत्री आरआर पाटिल की तिकड़ी भी इस छोटे से मंच पर पहुंच गई। रब्बियों को इतने वीआईपी जुटने की उम्मीद नहीं थी। इन आयोजन से अलग नरीमन हाउस दीवारें तो आतंक वधशाला जैसी लगती है। यह हाल देखकर शशि थरुर भी कांप उठे। पांच मंजिलों वाले इस भवन की हर मंजिल पर गोलियों के सैकड़ों निशान हैं। गे्रनेड से फटी दीवारें अब तक वैसी ही हैं। पूरे घर में बड़ी-बड़ी दरारें हैं। रब्बी गैब्रियल का पूजा घर, रसोई, शयनकक्ष यहां तक बाथरूम तक में गोलियों की इबारत खुदी है। भवन की तीसरी मंजिल पर छेद अब तक वैसा ही है जिसे एनएसजी ने रॉकेट लांचर दाग कर किया था और भवन में घुसे थे। एक उदास कमरे में इस रब्बी दंपति के नन्हे शिशु मोशे के खिलौने भी जस के तस बिखरे हैं। दरअसल इस घर में सब कुछ जस का तस है। बस पूजा गृह की गोलियों से छलनी दीवार के आगे एक ताजी मोमबत्ती जल रही है। भारत में यहूदियों के बहुत छोटे खबाद समुदाय के लिए गैब्रियल और रिविका की मौत गहरा सदमा है, यह बहती आंखों और रुंधे गलों में साफ दिख रहा था। नरीमन हाउस के भीतर गुजरी यंत्रणा भी महसूस की जा सकती थी। इसके अलावा जो दिखा वह थी सिर्फ राजनीति।

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