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शुक्रवार, नवंबर 13, 2009

पराली से बने बिजली, खाद से खेत बने जवान


किसान एक सप्ताह देर से गेहूं की बिजाई करता है तो उसे प्रति एकड़ ढाई क्विंटल उत्पादन कम मिलेगा। अगर देरी दो सप्ताह की है तो नुकसान पांच क्विंटल होगा। इसी को ध्यान में रखकर किसान गेहूं की बिजाई करने के लिए खेत करने को धान की पराली जला देते हैं। यह सरासर गलत है। खेतों को पराली की आग से बचाने के लिए लुधियाना स्थित पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) व गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनीमल साइंस यूनिवर्सिटी (गडवासू) के विज्ञानी प्रयास में जुटे हुए हैं। वे पराली नहीं जलाने के विकल्पों पर काम कर रहे हैं। एक महत्वपूर्ण विकल्प तो यही है कि पराली को उन राज्यों को बेचा जाए, जहां चारे की कमी है। ऐसे राज्यों में राजस्थान, जम्मू-कश्मीर व गुजरात शामिल हैं। इससे किसान की पौ बारह हो जाएगी। उसके लिए यह स्थिति आम के आम गुठलियों के दाम वाली हो जाएगी। बस किसान को पराली जलाने के बजाय इस दिशा में सोचना होगा। पीएयू के वीसी डा. कंग ने खुलासा किया कि पराली का सदुपयोग करने के लिए पंजाब व केंद्र सरकार को दोनों यूनिवर्सिटियों ने कई प्रस्ताव बनाकर दिए हैं। उन्होंने पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए भी लिखा है। उनके अनुसार, 14 नवंबर से गेहूं की बिजाई सब जगह शुरू हो रही है। खेत को च्च्छे ढंग से खाली करने के लिए एक महीना लगता है। विज्ञानियों ने जीरो ट्रिल मशीन तैयार की है, जो पराली को जमीन पर बिछाती चलती है। उसके बाद हैपी सीडर का इस्तेमाल किया जाता है। किसानों को जागरूक करने के लिए दो साल से हैप्पी सीडर मशीन का ट्रायल दिया जा रहा है। इसके अलावा स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम को कंबाइन हार्वेस्ट के साथ लगा दिया जाता है, जो स्ट्रा यानी पराली को जमीन पर बिछा देता है। बेलिंग स्ट्रा मतलब पराली को बेल बनाकर चारे के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। अभी बेलिंग मशीन की कीमत छह लाख रुपये है, जिसे कम करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इलेक्ट्रीसिटी बेलिंग में भी पराली का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस मशीन में सिलिकॉन अधिक होता है, जिसकी ज्वलन क्षमता 750-800 डिग्री होती है। तापमान बढ़ाने के लिए इसके साथ लकड़ी व अन्य ईधन को मिश्रित किया जा सकता है। इससे बिजली प्राप्त की जा सकती है। बायो-गैस बनाने के लिए भी पराली प्रयोग में लाई जा सकती है। पीएयू के निदेशक (अनुसंधान) डा. परमजीत सिंह मिन्हास ने बताया कि यूनिवर्सिटी के डा. एके जैन कपूरथला में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रीन्युएबल एनर्जी पर काम कर रहे हैं। यूनिवर्सिटी का लक्ष्य है कि भविष्य में पराली का इस्तेमाल अधिक से अधिक ऊर्जा बनाने में किया जाए। गडवासू के वीसी डा. वीके तनेजा ने बताया कि उनके यहां पराली को पशुओं के लिए इस्तेमाल करने पर खोज चल रही है। न्यूट्रीशियन विभाग पशुओं के लिए धान की पराली व गेहूं की तूड़ी का प्रयोग कर रहा है। पराली पशुओं के बिस्तर के लिए इस्तेमाल की जा रही है। इससे पशुओं के मलमूत्र से कंपोस्ट खाद तैयार की जाती है। यूरिया के अलावा अन्य न्यूट्रीटेंस व मिनरल मिलाकर इस खाद की गुणवत्ता भी बढ़ाई जा सकती है।

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