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शुक्रवार, नवंबर 13, 2009

राजनीतिक दलों ने वंशवाद से की तौबा

विधानसभा चुनाव में इस बार वंशवाद से सभी पार्टियों ने परहेज किया है। कांग्रेस,भाजपा समेत क्षेत्रीय दलों ने टिकट वितरण में वंशवाद को तरजीह नहीं दी। बिहार के मुख्यमंत्री बीते उपचुनावों में वंशवाद को नजरंदाज कर सियासी तौर पर भले ही घाटे में रहे हों,पर झारखंड में सभी पार्टिया कुछ हद तक उनकी मुहिम को आत्मसात करती नजर आई। अपवाद के तौर पर एक-दो क्षेत्रों में बड़े दिग्गजों के नाते-रिश्तेदार जरूर टिकट पा गए हैं,लेकिन इसके कारण परिस्थितिजन्य रहे। मसलन डालटनगंज विधानसभा क्षेत्र से चतरा के निर्दलीय सांसद इंदर सिंह नामधारी के पुत्र दिलीप सिंह नामधारी भाजपा से टिकट हासिल करने में सफल रहे,लेकिन पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री सांसद अर्जुन मुंडा की पत्नी को टिकट नहीं दिया। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और सांसद पीएन सिंह,गिरिडीह के सांसद रविंद्र पांडेय,सांसद देवीधन बेसरा अपने पुत्रों व गोड्डा के सांसद निशिकांत दूबे अपनी पत्नी को टिकट दिलाने में विफल रहे। कांग्रेस ने भी भाई-भतीजावाद की परंपरा को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई। जामताड़ा के पूर्व सांसद फुरकान अंसारी अपने बेटे डा. इरफान को जामताड़ा विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिलवाने चाहते थे,पर पार्टी ने उन्हें टिकट थमा दिया। पूर्व सांसद चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे अपने बेटे को विश्रामपुर से टिकट दिलाने में नाकाम रहे। कांग्रेस ने पूर्व सांसद थामस हांसदा के बेटे की बजाए थामस को को ही टिकट दिया। झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो शिबू सोरेन ने भले बेटे हेमंत को दुमका व तमाड़ से तथा दिवंगत पुत्र दुर्गा सोरेन की पत्नी को जामा विधानसभा क्षेत्र से उतार दिया हो, लेकिन पार्टी के दूसरे नेताओं की इसी तरह की ख्वाहिश को पूरा नहीं किया। वंशवाद का दिलचस्प पहलू कांग्रेस के पूर्व सांसद बागुन सुम्ब्रई ने रचा। वह अपने इकलौते बेटे विमल सुम्ब्रई की दावेदारी के विरोध में खुद खड़े हो गए। पार्टी ने भी चाईवासा से पुत्र की जगह उन्हें टिकट थमा दिया।

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