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रविवार, नवंबर 15, 2009

खो गई पीहू-पीहू, नहीं दिखते तीतर-बटेर





फिजा में राष्ट्रीय पक्षी मोर की पीहू-पीहू घुटती जा रही है और हरियाली में उड़ारी भरने वाले तीतर गायब से हो गए हैं। बटेर बाट जोहने के बावजूद अब दिखाई नहीं देते। शिकार सहित विभिन्न कारणों से ये तीनों पक्षी महफूज नहीं हैं। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में ही इनकी संख्या तेजी से घटी है। कुवि के प्राणी शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डा. जेएस यादव के अनुसार कुछ साल पहले तक परिसर में मोरों की संख्या सैंकड़ों में थी और तीतर व बटेर भी खूब उड़ारी भरते दिखाई देते थे। लेकिन अब संख्या उतनी नहीं रही। अनुमान के अनुसार मोरों की संख्या एक तिहाई तक सिमट गई है। सुबह-शाम अक्सर रंग-बिरंगे पंखों के साथ नृत्य करते मोर अब परिसर में काफी कम दिखाई देते हैं। परिसर में ही रहने वाले कुवि कर्मचारी प्रताप सिंह बताते हैं कि पहले मोर उनके आंगन तक आ जाते थे, लेकिन अब कभी-कभार ही दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि पिछले एक दशक में विश्वविद्यालय में तेजी से निर्माण हुआ है और हरियाली के स्थान पर भवन खड़े हो गए हैं। कुलपति निवास के निकट स्थित बाग में सबसे ज्यादा मोर दिखाई देते थे, लेकिन अब वहां अकादमिक स्टाफ कालेज का अतिथि गृह बन रहा है। काफी जमीन आवासीय जरूरतों के चलते प्रयुक्त हो गई है। हालांकि परीक्षा शाखा के पीछे और महिला छात्रावासों के पास पेड़ों की संख्या बढ़ी है, लेकिन मोर, तीतर व बटेर की तादाद घटी है। कई साल पहले विश्वविद्यालय में रजबाहे के निकट मोर के पंख भी मिले थे। लिहाजा परिसर में मोर के शिकार की आशंकाओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता। 1975 में लाए गए थे तीन मोर : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में 1975 में तीन मोर लाए गए थे। डा. जेएस यादव बताते हैं कि यह उन्हीं मोरों का वंश है। वर्ष 1997-98 तक मोरों की संख्या अच्छी-खासी रही, लेकिन अब तेजी से इनकी संख्या में कम होती जा रही है। डा. यादव का मानना है कि अधिक निर्माण के कारण कुछ मोर ब्रह्मसरोवर व निट परिसर के अलावा खेतों की तरफ निकल गए होंगे। उन्होंने बताया कि जब 1968 में वह विश्वविद्यालय में आए तो, उस वक्त यहां चोटी वाले लार्क समेत बहुत सी प्रजातियों के पक्षी थे। इनमें तीतर व बटेर की काफी संख्या थी। उस समय झाडि़यां व पेड़ भी अधिक बीड़ में भी नहीं परिस्थितियां अनुकूल : जिले में स्थित बीड़ व जंगल में भी इन तीनों वन्य प्राणियों के अनुकूल माहौल नहीं है। स्योंसर स्थित सरस्वती वन विहार में भी मोरों की संख्या कम होती जा रही है। सौंटी बीड़ में भी वन्य प्राणियों के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं। सौंटी निवासी पवन पूनिया बताते हैं कि करीब 500 एकड़ के इस आरक्षित वन में वन्य प्राणियों के लिए पीने के पानी के पुख्ता प्रबंध नहीं हैं। वन्य प्राणी निरीक्षक रामकरण का कहना है कि ये व्यवस्थाएं विभाग द्वारा उच्च स्तर पर की जाती है। हालांकि मोरों की संख्या कम होने के लिए वह बढ़ती आबादी के दबाव और बड़े पेड़ों की घटती संख्या को मानते हैं। लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता : कुवि के प्राणी शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. रजनीश शर्मा भी वन्य प्राणियों की घटती संख्या पर चिंतित हैं। उनका कहना है कि मोर, तीतर व बटेर दिखाई तो देते हैं, परंतु संख्या अब उतनी नहीं है। इनके संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। इसी मकसद से प्राणी शास्त्र विभाग द्वारा वन्य प्राणी संरक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया है। लोगों को विस्तृत जानकारी देने के लिए विभाग में प्रदर्शनी लगाई गई है। उन्होंने बताया कि विभाग के विद्यार्थी मोरों पर शोध भी कर रहे हैं। वन्य प्राणियों पर संकट के कारण ठोस : कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राणी शास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. रजनीश शर्मा का कहना है कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में कुत्तों की संख्या बढ़ गई है। वह मोर, तीतर व बटेर की उड़ने की कम क्षमता का फायदा उठा कर उनका शिकार करते हैं। इसके अलावा लोग खेतों में कीटनाशकों व रासायनिक खादों का अंधाधुंध प्रयोग कर रहे हैं। इसके चलते वन्य प्राणी बेमौत मर रहे हैं। कुछ लोग फसलों की सुरक्षा के लिए बाड़ की तारों में करंट भी छोड़ते हैं। कुछ तांत्रिक व ओझा भी मयूर पंखों का झाड़-फूंक के लिए इस्तेमाल करते हैं। लिहाजा यह भी मोरों के लिए बड़ा खतरा है। पेचीदा है वन्य प्राणियों की गणना : वन्य प्राणियों की गणना का काम बेहद पेचीदा है और इसके लिए पूरा नियोजन करना पड़ता है। डा. जेएस यादव बताते हैं कि जिस क्षेत्र में मोर जैसे प्राणियों की संख्या पता लगानी हो, पहले उसे सेक्टरों में बांटा जाता है। एक निश्चित समय पर निर्धारित सेक्टरों में आदमियों को गिनती पर लगाया जाता है। नियत समय में गणना पूरी की जाती है। डा. यादव बताते हैं कि वन्य प्राणी स्थान बदलते रहते हैं, इसलिए यह बेहद चौकसी का काम है।

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