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शनिवार, जनवरी 09, 2010

महंगाई से सहमी कांग्रेस, बढ़ी बेचैनी

नई दिल्ली, बेकाबू होती महंगाई पर कार्यकर्ताओं का जवाब देना कांग्रेस के लिए मुश्किल होने लगा है। आम आदमी का हाथ, कांग्रेस के साथ की पार्टी की पहचान का मखौल बनने लगा है। यही वजह है कि कांग्रेस सरकार और कृषि मंत्री शरद पवार को महंगाई रोकने की तल्ख नसीहतें देने लगी है। पार्टी सूत्रों के अनुसार महंगाई को लेकर बनते जनमानस और उसके सियासी असर को लेकर कांग्रेस नेतृत्व का नजरिया सरकार के शीर्ष स्तर तक बताया जा चुका है। संभवत: इसी का असर था कि बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया समेत आयोग के कुछ सदस्यों के साथ अनौपचारिक चर्चा की। हालांकि महंगाई रोकने के लिए सरकार की किसी ताजा पहल का अब भी इंतजार है। इस मसले पर सरकार की बेचारगी का आलम यह है कि महंगाई के ताजे उछाल के बावजूद उपभोक्ता मूल्यों पर कैबिनेट की समीक्षा समिति की पिछले कुछ हफ्तों में बैठकें तक नहीं हो पा रही हैं। महंगाई पर कांग्रेस की सियासी सिहरन अकारण नहीं है। दाल, खाद्य तेल व चीनी से लेकर तमाम जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर जनता ही नहीं उसके अपने कार्यकर्ता व नेता ही सवाल उठा रहे हैं। वरिष्ठ नेताओं को मेल-मुलाकातों में ही नहीं चिठ्ठियां के जरिए भी कार्यकर्ता महंगाई से बढ़ती जनता की परेशानी बयान कर रहे हैं। पार्टी के एक महासचिव ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि कार्यकर्ताओं के ऐसे पत्र उन्हें रोजाना मिल रहे हैं। इसमें जरूरी वस्तुओं के दाम बढ़ने को लेकर बार-बार आगाह करने के कृषि मंत्री पवार के रुख पर भी सवाल उठाए गए हैं। अनौपचारिक चर्चा में पवार की महंगाई बढ़ने की आशंका के बयानों में पार्टी नेता सियासत देख रहे हैं। शायद इसीलिए पार्टी महासचिव जनार्दन द्विवेदी के जरिए कांग्रेस ने पवार और सरकार दोनों को महंगाई पर अपना घर सुधारने का संदेश दिलवाया। महंगाई पर पवार के बयानों की ओर इशारा करते हुए द्विवेदी ने कहा, मंत्रियों और सरकार को केवल समस्याओं की खामियां ही नहीं निकालनी चाहिए, अलबत्ता इसे दूर करने का रास्ता निकालना चाहिए। ऐसे बयानों से जमाखोरों व कालाबाजारियों को मौका मिलने की बात कह पार्टी के सचिव मोहन प्रकाश ने भी पवार पर निशाना साधा। महंगाई पर कांग्रेस की चिंता और बेचैनी का यह अब तक का सबसे मुखर इजहार है। पार्टी यह मान रही है कि पिछले छह महीने में हालात सुधरने की बजाय और बदतर हुए हैं।

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