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शनिवार, अक्तूबर 30, 2010

गुरु शिष्य के पावन और पवित्र रिश्तों पर एक बार फिर से कटघरे में

डबवाली:
गुरु शिष्य के पावन और पवित्र रिश्तों पर एक बार फिर से कटघरे में है। पिछले एक दो वर्षों में प्रदेश में दर्जनों बार दोहराई गई इस प्रकार की घटनाऐं साफ तौर पर दर्शा रही है कि इन घटनाओं की पुर्नावृति रोकने के लिए उठाये गये कदमों में कहीं कहीं कुछ खामी रह गई है। ताजा घटना में डबवाली उपमंडल के गांव लंबी में गुरु शिष्य के रिश्ते की मर्यादा जिस प्रकार कलंकित हुई है। उसने समाज और उसके तानेबाने को भी झंझोड़ कर रख दिया है। पुरातन सनातन धर्म में गुरु का दर्जा भगवान से ऊपर माना गया है। समाज के अन्य वर्गों के साथ शिक्षक वर्ग भी इस घटना से लज्जित है। विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण की जिम्मेवारी संभालने और उन्हें चरित्र प्रमाण पत्र देने के अधिकार रखने वालों के चरित्र में इस कद्र गिरावट खेदजनक है वहां एक गंभीर विचारनीय विषय भी बन चुका है सरकार के कंधों पर अब अध्यापकों के चरित्र निर्माण का बोझ भी महसूस किया जाने लगा है। इस गंभीर विषय पर इस संवाददाता इस सरोकार को लेकर क्षेत्र में जाने माने शिक्षाविदों से वार्तालाप कर उनकी राय जानी तो सभी ने एक स्वर में इस तरह के मामलों में आरोपियों के खिलाफ न्याययिक कार्यवाही के साथ सामाजिक कार्यवाही की भी अनुशंसा की।
शिक्षाविद तथा गुरु नानक कालेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य ने कहा कि ऐसी घटना समाज के पतन की द्योतक है। गुरु के कंधों पर चरित्र निर्माण के साथ-साथ विद्यार्थियों की रक्षा की भी जिम्मेवारी होती है लेकिन रक्षक ही भक्षक बनने की राह पर दौड़ रहा है। उन्होंने ऐसी घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए इन्हें जड़ से खत्म करने की वकालत तो की ही साथ ही में इन कार्यों में संलिप्त इस पेशे से जुड़े लोगों के खिलाफ कठोर कार्यवाही में नौकरी से बर्खास्तगी को प्राथमिकताओं में शामिल करना और आरोपी की सामाजिक बहिष्कार भी समय की आवश्यकता बताया।
रिटायर्ड एनसीसी अधिकारी शशिकांत शर्मा, शिक्षक दर्शन अंजान तथा शिक्षाविद और सेवानृवित मुख्याध्याक दीदार सिंह ग्रोवर भी ऐसी घटनाओं को शर्मनाक करार देते हुए कहते है कि ऐसे लोगों का शिक्षा विभाग मेें कोई भी स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि शिक्षा चरित्र निर्माण करती है लेकिन अपने पेशे व पद को कलंक की चादर लपेटने वालेेे किस प्रकार के चरित्र निर्माण का कार्य करेंगे यह सर्वविदित है। न्यायालय से सजा के हकदार तो वे लोग है ही, समाज में भी ऐसे लोगों के खिलाफ सामाजिक सजा का प्रावधान भी होना चाहिए।
गुरुनानक कालेज में सामाजिक विज्ञान विषय के प्रवक्ता अमित बहल भी इस घटना से आहत है और इस घटना की चुभन अपने सिने में महसूस कर वे गुरुकुल परंपरा को समय की जरूरत बताते है। उन्होंने कहा कि पश्चिम सभ्यता के पीछे दौड़ में हमने शिक्षा का व्यवसायीकरण तो कर दिया लेकिन सामाजिक मूल्यों को भी पीछे छोड़ आये। इस तरह की घटनाऐं उसकी दौड़ का परिणाम है। उन्होंने कहा कि अगर शिक्षा के मंदिर में बेटियां ही सुरक्षित नहीं है तो स्त्री शिक्षा और बराबर भागीदारी दावे खोखले है। उन्होंने कि जहां उनकी सुरक्षा की जिम्मेवारी सरकार पर है लेकिन समाज व परिवार भी इसके लिए उतना ही जिम्मेवार बनाना होगा और उन्हें ऐसा वातावरण उपलब्ध करवाना होगा कि वे बिना किसी संकट से शिक्षा जैसा अनमोल रतन ग्रहण कर सके।
भाजपा की महिला विंग की प्रदेशाध्यक्षा रेणू शर्मा भी शिक्षा के मंदिर को कलंकित करने वालों के खिलाफ कठोर कार्यवाही किये जाने शिक्षाविदों के विचारों से इत्तफाक रखती है। इस तरह की बढ़ रही घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि अगर शिक्षा ग्रहण करने जा रही परिवार की बेटी ही वहां सुरक्षित नहीं है तो समाज की उन्नति के सपने देखना बेमायने है। समाज तभी सभ्य होगा जब उसके निर्माता सभ्य होंगे। उन्होंने कहा कि बिगड़ों को सुधारने के लिए डंडा जरूरी है।

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