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गुरुवार, सितंबर 01, 2011

अन्ना टीम को लडऩा ही पड़ेगा ससंदीय चुनाव

अन्ना हजारे के सफल अनशन समापन पर अभी देशभर में जश्र का माहौल जारी है लेकिन देशवासियों को जो उम्मीद इस दौरान बंधी है क्या यह अपने अंजाम तक पहुंच पाएगी और अन्ना टीम को भविष्य में क्या रणनीति बनानी होगी यह महत्वपूर्ण यक्ष प्रश्र आज सबके सामने है।
अन्ना हजारे के जनआंदोलन को देशभर से बेमिसाल स्वतस्फूर्त जन समर्थन मिलना यह जाहिर कर गया कि भारतवासी भ्रष्टाचार रूपी राक्षस से किस कद्र परेशान है। हमेशा की तरह सता के घोड़े पर सवार सतारूढ़ दल के रणनीतिकार यह अंदाजा लगाने में पूरी तरह से चूक गए कि जन लोकपाल बिल का आंदोलन केवल मात्र मीडिया द्वारा प्रचारित किया गया नहीं है। बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस प्रकार से कुचला गया उससे कांग्रेस में कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम धड़ा हावी था लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं था कि बाबा रामदेव ने अपने आंदोलन का मुख्य हथियार लाखों करोड़ों रूपए का काला धन विदेशों से भारत लाने को बनाया और यह बात जग जाहिर है कि अगर यह काला धन देश में आता भी है तो प्रत्यक्ष इससे किसी देशवासी को कोई लाभ नहीं दिख रहा था। जबकि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार से पीडित आम आदमी की नब्ज को पकड़ा तथा जनमानस यह भी समझने में सफल रहा कि सही कानून के आने से निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पर व्यापक अंकुश लगने की संभावना नकारी नहीं जा सकती। क्योंकि सूचना अधिकार कानून व लोकायुक्त के कर्नाटक मुख्यमंत्री प्रकरण से यह लगने लगा है कि सही कानून का क्रियानवन प्रभावशाली साबित हो सकता है। दूसरे बाबा रामदेव द्वारा सन्यासी होते हुए 1200 करोड़ का आर्थिक सम्राज्य स्थापित किया जाना जबकि अन्ना हजारे का मंदिर में प्रवास करना दोनों आंदोलनों को मिले जन समर्थन में अंतर पैदा करने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक साबित हुआ। रही सही कसर कांग्रेस प्रवक्ता मनीश तिवारी द्वारा साफ सुथरे व्यक्तित्व के धनी अन्ना हजारे को भ्रष्ट साबित करने के असफल प्रयासों ने पूरी कर दी। केंद्र सरकार के रणनीतिकार अन्ना हजारे को जेल से मजबूरीवश रिहा करने के बाद भी जन आंदोलन की तीव्रता को समझ नहीं पाए तथा रामलीला मैदान में पहुंचे लोगों के बारे में यह सोचकर निश्चित हो गए कि यह भीड़ एक-दो दिन बाद थक हार कर अपने-अपने घर चली जाएगी। लेकिन दिनबदिन रामलीला मैदान पर देशभर से आंदोलनकारियों का हजूम बढ़ता ही गया। तब जाकर इन लोगों के हाथ पांव फूलने शुरू हुए तथा इन्होंने हार नहीं मानी व सिविल सोसायटी के सदस्यों को संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने का प्रचार आरंभ कर दिया। यह दाव भी जब उल्टा पड़ता दिखा तो आखिरकार दलित, पिछड़ा वर्ग से टीम अन्ना की दूरियां बढ़ाने का कुप्रयास भी किया गया। जिसकी बानगी पूरे देश ने संसद में बहस दौरान सपष्ट रूप से देखी। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिन नेताओं की दलित व पिछड़ा वर्ग वोट बैंक से राजनीतिक दुकान चल रही है उन्हें भी मालूम है कि भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा पीडि़त तो दलित व पिछड़ा वर्ग ही है। चूंकि मध्य वर्ग तो पैसे के बल पर अपने काम धंधे फिर भी करवा लेता है लेकिन दलित व पिछड़ा वर्ग की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनकी दुविधा ज्यादा है। इस घटनाक्रम में टीम अन्ना को मिले जबरदस्त जन समर्थन के बावजूद ये तानाकशी सुनने को मिली कि 'चुनाव जीतकर आओ व संसद में बैठकर कानून बनाओंÓ और यह बोली कोई दबे तो कोई खुले स्वर में हर राजनीतिक दल की थी।
वे शायद आसाम का उदहारण भूल चुके हैं जब विद्यार्थियों ने आंदोलन उपरांत चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लिया व असमगण परिषद पार्टी का गठन किया तथा तमाम राजनीतिक दलों को धूल चटाते हुए प्रफूल कुमार महंत प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। वहीं आंध्रप्रदेश में अभिनेता से एकाएक राजनीति में उतर कर एनटी रामाराव ने तेलगुदेशम पार्टी का गठन किया व दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई। ऐसी ही स्थिति 1977 में आपात काल उपरांत लोकसभा चुनाव में बनी जब जनता पार्टी ने सता पर कब्जा जमा लिया। हालांकि उसमें ज्यादातर अन्य पार्टियों से आए राजनीतिज्ञ शामिल थे। अब अन्ना हजारे पूरे देश में भ्रमण कर रहे है तथा उन्हें व टीम अन्ना को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि संसदीय प्रणाली के मुताबिक देश वासियों से वे जन समर्थन मांगे तथा आने वाले लोकसभा चुनाव में खुद जैसे प्रत्याशी उतारे ताकि मौजूदा संसद में पहुंचे हुए सदस्यों को भी अहसास हो जाए कि अन्ना हजारे को ठोस जन समर्थन प्राप्त है व अन्ना हजारे देश के प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित होते है तो देश वासियों के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और कोई नहीं हो सकता। आखिर कब तक एक-एक जन लोक कल्याणकारी कानून को बनवाने के लिए अन्ना हजारे को अनशन पर बैठना पड़ता रहेगा।


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