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गुरुवार, दिसंबर 20, 2012

मोदी की तूफानी जीत, क्या बुक करेगी सेंटर में सीट?

नई दिल्ली। गुजरात मे नरेंद्र मोदी की तूफानी जीत का असर गांधीनगर से ज्यादा दिल्ली ने महसूस किया है। मोदी समर्थकों की खुली मांग है कि बीजेपी अब उन्हें 2014 के आम चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे। लेकिन बीजेपी से लेकर आरएसएस तक के एक धड़े को मोदी की निरंकुश शैली बिल्कुल मंजूर नहीं है। वहीं, उनके नाम पर जेडीयू जैसे एनडीए के सहयोगी कभी भी छिटक सकते हैं। ऐसे मे सवाल उठ रहा है कि क्या गुजरात, मोदी की शक्ति और सीमा, दोनों है। मोदी के शुभचिंतकों की राय पढ़िए-
राम जेठमलानी: हिंदुस्तान में पीएम बनने लायक कोई है तो वो हैं मोदी।

नरेंद्र मोदी के भाई: आज देश की जनता चाहती है के वो PM बनें।
गिरिराज सिंह:मुझे तय करना होता तो मेरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी होता।
नरहरि अमीन: मोदी देश के PM बनते हैं तो जैसे गुजरात का विकास हुआ वैसा पूरे देश का होगा।
साफ है कि गुजरात पर तीसरी बार विजय पताका फहराकर मोदी ने दिल्ली के लिए अपनी दावेदारी मजबूत कर ली है। नतीजे आते ही मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताने की होड़ लग गई। इस जीत के बाद पार्टी आलाकमान पर कार्यकर्ताओं का दबाव और बढ़ेगा। गुजरात के बाहर बसा कार्यकार्ता भी मोदी के विकास के एजेंडे से अभिभूत है। लिहाजा जीत का जश्न अहमदाबाद और गांधीनगर में ही नहीं, दिल्ली, मुंबई और बिहार तक देखा गया।
मोदी की जीत के बाद दिल्ली में बैठे पार्टी की पहली कतार के नेताओं में भी बेचैनी स्वाभाविक है। बीजेपी नेता वेंकैया नायडू ने कहा कि मोदी के पीएम पद पर सही समय पर पार्टी फैसला लेगी। मोदी का कद बढ़ा है और वो सीएम रहते हुए भी राष्ट्रीय नेता हैं। बेचैनी बीजेपी में ही नहीं पूरे संघ परिवार में है। संघ को मोदी का निरंकुश अंदाज नागवार गुजरता है। इसके पीछे एक वजह ये भी बताई जाती है कि गुजरात में मोदी ने संघ को हाशिए पर डाल दिया था।
मोदी का खेमा भी इस जीत को केवल मोदी की जीत की तरह पेश कर रहा है। लेकिन संघ के सामने सवाल ये है कि वो करे तो क्या करे। दरअसल, इस जीत के साथ ही मोदी का कद किसी मीनार की तरह हो गया है। मोदी के वजन का दूसरा चेहरा फिलहाल संघ के सामने नहीं है। शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह मोदी की काट नहीं हो सकते। हिंदुत्व का चेहरा बन चुके मोदी का खुला विरोध संघ के लिए संभव भी नहीं है।
लेकिन सवाल सिर्फ बीजेपी और संघ का नहीं 2014 चुनाव के लिए एनडीए का कुनबा बचाने और बढ़ाने का भी है। कुनबा बढ़ाने की इस कोशिश में मोदी व्यक्तिगत तौर पर काफी पहले से सक्रिय हैं। जयललिता और नवीन पटनायक से रिश्तों की पींग बढ़ाना इसी कवायद की कड़ी है। दोनों ने मोदी को जीत की बधाई दी है।
लेकिन सवाल बीजेपी के पुराने सहयोगी जेडी (यू) का है। नीतीश पहले ही साफ कर चुके हैं कि बतौर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी उनकी पार्टी को मंजूर नहीं। जेडीयू नेता अली अनवर ने कहा है कि पीएम उम्मीदवार ऐसा हो जिसकी सेकुलर छवि हो और मोदीजी के बारे में सब जानते हैं। हमको सेकुलर चेहरे वाला ही चाहिए हम ये बात बता चुके हैं।
जाहिर है गठबंधन की राजनीति में क्षेत्रीय क्षत्रपों की अहम भूमिका है। उन्हें साधना आखिरी वक्त तक चुनौती होता है। लेकिन मोदी के आगे अड़ंगा डालने के लिए विरोधियों के पास एक ठोस तर्क और है। गुजरात से बाहर मोदी कुछ खास नहीं कर पाते। लोकसभा चुनाव में वो महाराष्ट्र के प्रभारी थे मगर उसके नतीजे कुछ खास नहीं निकले। गुजरात से बाहर चुनाव प्रचार में भी मोदी जहां गए वहां कुछ खास करिश्मा नहीं हुआ।

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