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मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

एफडीआई इन रिटेल किसानों के लिए होगी वरदान

वरिष्ठ पत्रकार व राजनितिक के जानेमाने विशलेशक महावीर सहारण 
महावीर सहारण
  एफडीआई इन रिटेल पर संसद में बहस बेहद दिलचस्प रही। सत्तापक्ष संख्या बल के मामले में अवश्य विपक्ष पर जीत दर्ज करने में सफल हुआ परंतु इस मुद्दे की व्यवहारिकता को संसद एवं सीधा प्रसारण देख रहे देशवासियों के सामने स्पष्ट नहीं कर पाया। दूसरी और विपक्ष भी अपनी परम्परा के मुताबिक केवल मात्र वोट बैंक बढ़ाने की जुगत में विरोध के लिए विरोध करने की परिपाटी पर चलता प्रतीत हुआ।देश को आजाद हुए 65 वर्ष बीत चुके है इस दौरान कई ऐसे मौके आए जब परम्परा से हटकर देश में नीतिनिर्धारण हुआ पर कभी भी ऐसे गंभीर मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष की सहमति नहीं बन पाई। कम्प्युटर युग की शुरूआत का उदहारण हमारे सामने है कितना हो-हल्ला किया गया था   आज क्या स्थिति है? इसी कम्प्युटर का कमाल है कि हमारे लाखों युवा उच्च वेतन प्राप्त कर रहे है तथा देश में प्रतिवर्ष हजारों-करोड़ रूपए की   विदेशी मुद्रा आ रही है। आप विचार करिए अगर विरोध को मानकर इस नीति को लागू न किया जाता तो देश किस स्थिति में होता?डंकल प्रस्ताव लागू करते समय भी देश में ऐसा ही माहौल बनाया गया। आज किसान समझ चुका है तथा वह थोड़ा मंहगा ही सही उच्च गुणवत्ता का बीज खरीदने हेतु प्रयासरत्त रहता है। एक दशक पूर्व मंहगे कीटनाशकों के प्रयोग के बावजूद निम्रस्तरीय बीज के चलते कपास उत्पादक किसान बर्बादी की कागार पर पहुंच गए थे। परंतु बीटी बीज के आगमन के पश्चात कपास की पैदावार 5 से 8 किवंटल प्रति एकड़ निश्चित तो हो गई है। जबकि काफी हद तक महंगे कीटनाशकों से भी छुटकारा मिल गया है।वर्तमान चर्चा के ये तीन बिन्दू उभर कर सामने आए। एक एफडीआई इन रिटेल से करोड़ों के रोजगार का खात्मा, दूसरा किसान वर्ग को लाभ, तीसरा स्वदेशी आंदोलन को झटका।भारत  120 करोड़ आबादी का देश है तथा गली मौहल्लो से गांव-गुवाड़ तक परचून की दुकानों से भावनात्मक एवं मजबूरी का जो रिश्ता देश की बहुसंख्यक आबादी का बना हुआ है। उसे बिग बाजार, रिलांयस, इजी-डे व हरियाली बाजार आदि नहीं तोड़ पाए केवल उच्च आय वर्ग का एक हिस्सा ही इन स्टोरों की तरफ गया है और वैसे भी अभी तक विदेशी स्टोर केवल देश के अधिकत्तम 53 शहरों में ही पहुंच पाएंगे। तथा विपक्षी शासित राज्यों में स्टोर खोलने की अनुमति न मिलने बाबत शहरों को बाहर कर दें तो यह संख्या केवल 16 ही रह जाएगी।  कपिल सिब्बल का कथन यहां सही भी हैं कि रियलटी बाजार में जो भाव पहुंच गए है। इन हालातों में शहर के बाहरी इलाकों में ही बड़े स्टोरों के लिए व्यवहारिक जगह मिल पाएगी। इसलिए प्रत्येक उपभोक्ता के लिए यह संभव नहीं हो पाएगा कि हर समय छोटी-मोटे सामान के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करे। इसलिए यह कहना किसी भी प्रकार से वाजिबनहीं है कि देश के 5 करोड़ रिटेल कारोबारी बर्बाद हो जाएंगे तथा उन पर निर्भर 20 करोड़ की आबादी की आर्थिकता समाप्त हो जाएगी। लेकिन एक बड़ा लाभ उपभोक्ताओं को इन सुपर दुकानों से यह हुआ है कि डुप्लीकेट उत्पादों से छुटकारा मिला है। दूसरा राज्य सरकारों एवं केंद्र सरकार को यह फायदा है कि यहां कर चोरी न के बराबर ही संभव है। तथा भविष्य में इन स्टोरों के माध्यम से सरकारी खजानें में भारी तादाद में राजस्व की बढ़ौतरी होगी।दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू जिस पर व्यापक चर्चा हुई कि क्या किसानों को लाभ होगा? हां किसानों को बड़े पैमाने पर लाभ होगा। सत्तापक्ष   बहस में अपनी बात को उचित तरीके से ही नहीं रख पाया। मैं एक उदहरण से इसे स्पष्ट कर देता हुं। उतरी भारत में राजस्थान के गंगानगर, हनुमानगढ़, पंजाब के फाजिल्का, फिरोजपुर, मुक्तसर, मोगा, बठिंडा, फरीदकोट  एंव हरियाणा के सिरसा, फतेहबाद, हिसार आदि जिलों क ी हजारों एकड़ भूमि में किन्नू नामक संतरा के समवर्ती फल के बागान है । किन्नु पौधे से टूटने के बाद जल्द खराब होने वाला फल है पूर्व में मार्केटिंग न होने के कारण किसानों को इसकी ज्यादा कीमत नही मिल पाती थी जब से सुपर स्टोर खुले है। किसानों को इसका अच्छा भाव मिलने लगा है । मौजूदा सीजन में दो लाख से लेकर तीन लाख प्रति एकड़ खेत में ही किन्नु की कीमत किसानों को मिल रही है जब कि कपास-चावल जैसी अन्य नगदी फसल से आय केवल 30 से 40 हजार प्रति एकड़ ही हो रही है। सत्तापक्ष को शायद इतनी महत्वपूर्ण जानकारी की फीडबैक नही थी। यह सम्भव क्यों हो पाया क्योंकि अब किन्नु पूरे देश में पहुंच पा रहा है। तथा यह सुपर स्टोर की अवधारणा से ही संभव  हो पाया है। क्या अब ऐसे हालातों में किन्नु उत्पादक किसान आत्महत्या  जैसा कदम उठाएगा?  क्या इन किसानों पर साहुकार या बैंक का कर्ज रह पाऐगा? यह तो केवल एक बानगी है तथा विभिन्न सब्जी एवं फल उत्पादक किसानों की दशा भी रिटेल स्टोर चैन से बदल सकती है।स्वदेशी आन्दोलन को नुकसान होने वाले बिन्दू पर चर्चा करना ही बेमानी है आज स्थितियां पूरी तरह से बदल गई है पूरा विश्व एक बाजार बन गया है । टैक्नोलाजी के मामले में अगर हम बाहरी देशों पर निर्भर है वहीं  विशाल आबादी के चलते मानवीय श्रम के बलबूते ही देश को प्रति वर्ष भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त हो रही है साथ ही लाखों रोजगारों का सजृन भी हुआ है । कृषि क्षेत्र से सम्बधित एक जिन्स के निर्यात से ही देश के एक हिस्से की तस्वीर भविष्य में बदलने वाली है राजस्थान व सीमान्त हरियाण पंजाब में पैदा होने वाले ग्वार का आमतौर पर भाव दो हजार प्रति किवंटल रहता आया है लेकिन ग्वार से बने पाउडर  ग्वारगम का प्रयोग तेल उद्योग में शुरू होने के कारण यही ग्वार बीते साल 33 हजार प्रति किवंटल तक बिक गया।  हैरानी जनक बात यह है कि राजस्थान में बहुतायत में होने वाले इस जिन्स उत्पादन का पैसा प्रति एकड़ इतना मिला जितना की उपरोक्त जमीन की उस समय कीमत थी। इस साल भी ग्वार के भाव 15 हजार प्रति किवंटल चल रहे है यह तभी सम्भव हो पाया है जब ग्वार से बना उत्पाद ग्वारगम  सौ फीसदी निर्यात हुआ। हमारे देश में ग्वार का प्रयोग तो केवल पशुओं के चारे के लिए ही होता रहा है । इस क्षेत्र में किसान सहित अन्य आबादी का यकायक जीवन स्तर एक साल की फसल से ही इतना बढ़ गया है जितना सरकारें आजादी के बाद से नहीं बढ़ा पाई। आज ग्वार उत्पादक किसानों के क्षेत्रों में किसानों के चेहरों  पर जो रोनक  देखी जा रही है क्या हम स्वदेशी आन्दोलन के बलबूते ऐसा कर पाये? नहीं कर पाये।हमें परिवर्तन करना ही होगा। लेकिन सोच समझ कर ताकि वर्ग विशेष कां हानि पहुंचाये बगैर ही दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकें तथा केवल इसी बात के लिए ही विरोध नहीं करना चाहिए कि हम विपक्ष में है। एफडीआई इन रिटेल कम से कम किसानों के लिए तो वरदान साबित होने ही जा रही है। यह बात आज का विपक्ष संभवत  एक दशक के बाद स्वीकार करें। 



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