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सोमवार, जनवरी 28, 2013

दिल्ली के इस गांव में रहता है सिर्फ एक शख्स


वीरेंद्र वर्मा
नई दिल्ली-नजफगढ़ से 10 किलोमीटर की दूर पर राजधानी में एक ऐसा भी गांव है जहां पिछले 15 सालों से एक ही इंसान रह रहा है। इस व्यक्ति का न कोई परिवार है, न कोई देखभाल करने वाला। गांव का 300 साल से भी ज्यादा पुराना इतिहास है। भले ही अब यह उजड़ गया हो लेकिन दिल्ली सरकार के रेवेन्यू रिकॉर्ड में आज भी इस गांव का नाम दर्ज है। नाम है शेरपुर डेयरी। इसी गांव के पते पर हरिनाथ नाम से एक ही वोटर आई कार्ड बना है। गांव के लोग कहां गए, कोई नहीं जानता। लेकिन हर गुरुवार का इस गांव में आसपास के लोग एक मजार पर दीया जलाने आते हैं। इसे सैय्यद के नाम से पुकारते हैं। कहा जाता है कि यहां दुआ मांगने पर सारी मुरादें पुरी हो जाती है।
 
इस गांव में हरिनाथ नाम के एक ही शख्स रहते हैं। उनकी उम्र 73 साल है। आसपास के गांव के लोग उन्हें बाबा हरिनाथ के नाम से पुकारते हैं। हरिनाथ बताते हैं कि जब वे इस गांव में आए थे तो मंदिर की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। उन्होंने यहां आकर सफाई की और इसमें पूजा शुरू की। हरिनाथ बताते हैं उनका परिवार पहले सेनका गुढ़ाना पटौदी के पास रहता था। काफी साल पहले उनके परिवार के सब लोगों की मौत हो गई और वे यहां आकर रहने लगे। पहले जंगल से लकड़ियां लाकर चूल्हे पर खुद खाना बनाते थे अब गांव के लोगों ने उन्हें गैस चूल्हा दे दिया है तो उस पर खाना बनाते हैं।
 
मुरादें पूरी करने वाली सैय्यद
गांव में औरंगजेब के वक्त की एक मजार है। गांव के लोग इसे सैय्यद कहते हैं। मान्यता है कि उजवा, घुम्मनहेड़ा, दरियापुर, हसनपुर, खड़खड़ी रौंद के लोग कई दशकों से इसे हैं। खड़खड़ी रौंद गांव में रहने वाले विजय कुमार बताते हैं कि उनके बुजुर्ग बताकर गए थे कि सैय्यद को पूजते रहना। खेड़ा डाबर गांव में रहने वाले देवेंद्र कुमार का कहना है कि ऐसी मान्यता है कि जो भी यहां आकर मुराद मांगते हैं उनकी मुराद पूरी होती है। हर गुरुवार को यहां लोग गुड़ की भेली और सफेद, नीली व पीले रंग की चादर चढ़ाकर दुआएं मांगते हैं।
 
कैसे पहुंचे इस गांव तक
यह गांव नजफगढ़ से करीब 10 किलोमीटर दूर है। नजफगढ़ से खैरा मोड़ जाकर इस गांव तक जाया जा सकता है। खैरा मोड़ से बाएं मुड़ने के बाद खेड़ा डाबर गांव आता है। गांव में दिल्ली सरकार का आयुर्वेदिक अस्पताल है। अस्पताल की दीवार के साथ-साथ खेतों में एक रास्ता जाता है। कुछ दूर चलने पर नाले पर एक पुल बना है। पुल से सीधे जाने पर इस गांव तक पहुंचा जा सकता है। रेवेन्यू डिपार्टमेंट के अधिकारियों को भी गांव की कोई खास जानकारी नहीं है। उजवा गांव के पटवारी का कहना है कि कभी यहां गांव था, लेकिन अब खेत हैं। रेकॉर्ड में गांव का नाम चला आ रहा है।
 

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