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सोमवार, जनवरी 28, 2013

चौटाला का जेल जाना इनेलो की सत्ता वापिसी की राह सुनिश्चित कर सकता है


महावीर सहारण
राजनीतिक विश्लेषक
सियासत इसी का नाम है केवल एक घटनाक्रम से प्रदेश में तमाम परिस्थितियां बदल गई प्रतीत होती हैं। सीबीआई अदालत द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला एवं विधायक अजय चौटाला को जेल भेजे जाने के उपरांत बने हालातों में सत्तारूढ़ कांग्रेस एवं हजकां-भाजपा गठबंधन एकाएक बैकफुट पर आ गया है जबकि लगातार दो विधान सभा चुनाव हारने के पश्चात व इनेलो सुप्रीमों के अनथक प्रयासों के बावजूद रंगत खो रही इनेलो को मानों इस घटनाक्रम ने संजीवनी ही प्रदान कर दी है तथा जिस प्रकार इनेलो के जिला स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन बड़ी जन सभाओं में तब्दील हो रहे हैं यह कांग्रेस एवं हजकां-भाजपा गठबंधन के लिए खतरे की घंटी है।
सीबीआई अदालत के फैसले से एकबारगी तो इनेलो का कैडर जहां हक्का-बक्का रह गया वहीं विरोधी पक्ष की तो मानो बांछें ही खिल गई थी तथा जल्दबाजी में कुछ नेताओं की अपरिपक्वता भी इस दौरान सामने आ गई कि 'इनेलो तो बस समाप्त हो गई हैÓ जैसे ब्यान उन्होंने दाग डाले। लेकिन सतही हालात तो बिल्कुल अलग ब्यां हो रहे हैं। इनेलो का कैडर सम्भवत: पूरे देश में सबसे सशक्त माना जाता है तथा स्व. चौ. देवी लाल, चौ. ओम प्रकाश चौटाला व अजय-अभय विगत लंबे समय से पार्टी कैडर को मजबूती प्रदान करते रहे हैं। इनेलो कैडर का प्रदेश में एक विशेष रूतबा भी हमेशा से ही रहा है तथा इस घटनाक्रम ने कैडर के सम्मान को चोट मारी है। किसी वर्ग, संगठन, जाति के सम्मान पर जब-जब आंच पहुंची है तब-तब इन्होंने वकार का सवाल बनाया है। यह इतिहास रहा है और इतिहास तो हमेशा ही दोहराया जाता रहा है। इनेलो कार्यकर्ता तमाम गिले-शिकवे भुलाकर अपने सम्मान पर हुए हमले से आहत होने की बजाए जबरदस्त एकजुटता दिखा रहे हैं जोकि राजनैतिक विश्लेषकों के लिए हैरानीजनक साबित होने जा रहा है। इनेलो समर्थकों के मिले जोरदार समर्थन से अभय चौटाला व इनेलो की राज्यस्तरीय टीम को राहत मिली है। अभय चौटाला 28 विधायकों व तीन दर्जन के करीब राज्यस्तरीय नेताओं की बदौलत इन विकट हालातों को सुखद परिस्थितियों में बदलने की कूवत रखते हैं वे अपनी संगठन क्षमता का परिचय भारतीय ओलम्पिक संघ के अध्यक्ष पद तक पहुंचकर बखूबी दे चुके हैं और वैसे भी मुसीबत की घड़ी में तो सहयोग व समर्थन देने की पुरातन भारतीय परम्परा रही है। आंध्र प्रदेश का ताजा उदाहरण हमारे सामने है। जगन रेड्डी ने जुम्मा-जुम्मा एक साल पूर्व ही पार्टी का गठन किया कोई उसका संगठन नहीं बन पाया। खुद हालांकि आय से अधिक सम्पत्ति मामले में जेल में हैं। मामला ले दे कर कांग्रेस द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग का ही है तथा आंध्र प्रदेश की जनता ने इसे बखूबी समझा है तभी 20 विधान सभा हलकों में हुए उपचुनावों में जगन रेड्डी की पार्टी 15 स्थानों पर विजय प्राप्त करने में सफल हुई है यहां कोई नेतृत्व नहीं था कोई संगठन नहीं था लेकिन हरियाणा में इनेलो की स्थिति जगन रेड्डी की पार्टी से तो हजार गुणा बेहतर है! फिर कैसे सवाल उठता है? कि इनेलो तो खत्म हो गई! एक अन्य महत्वपूर्ण बिंदु बहस का विषय प्रदेश में बनकर उभरा है कि क्षेत्रीय पार्टी के पास अपने जनाधार को कायम रखने के लिए नौकरी आदि का ही तो एक आकर्षण होता है और भजन लाल ने अगर आदमपुर, फतेहाबाद में नौकरियां बांटी तो बन्सी लाल ने भिवानी वासियों को उपकृत किया। वहीं भूपेन्द्र हुड्डा पर रोहतक पर मेहरबान होने के आरोप लगते रहे हैं जबकि इनेलो को तो अपने पूरे प्रदेश के कैडर का ध्यान रखना था। इसलिए इतना तो तय है कि इनेलो शासनकाल में क्षेत्र विशेष को तरजीह नहीं दी गई अब अगर सब कुछ मेरिट पर ही होना है तो फिर क्षेत्रीय दलों का तो वजूद ही समाप्ति के कगार पर पहुंच जाएगा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी चाहती भी तो यही है कि क्षेत्रीय दलों की चुनौती ही समाप्त हो जाए और आज प्रदेश में चौटाला परिवार के समर्थन में जो जबरदस्त अण्डरकरंट देखने में आया है उसका भी महत्वपूर्ण कारण यह है कि आम, जरूरतमंद को नौकरियां देने के लिए तो 10 साल की कड़ी सजा और हजारों करोड़ के घोटाले करने वाले केंद्र सरकार के नूर-ए-नज़र बने हुए हैं।
इन हालातों में अभय सिंह की कार्यक्षमता की महत्वपूर्ण परीक्षा है। उन्हें एक ओर जहां अपने पिताश्री व भाई की सम्मानजनक रिहाई के लिए कानूनी जंग लडऩी है वहीं प्रदेश का इनेलो कैडर उनसे बेहद उम्मीद लगाए है कि वे अपने नेतृत्वकौशल से विरोधियों को करारा जवाब दें। अब तक हुए आधा दर्जन कार्यकर्ता सम्मेलनों में जैसा जन सैलाब उमड़ा। इससे अभय सिंह यह तो समझ ही गए होंगे कि इन विकट हालातों में भी कितना विशाल जनसमर्थन उन्हें मिला है। अब जरूरत तो केवल इस जनसमर्थन को सहेजने मात्र की है।

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