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बुधवार, नवंबर 06, 2013

भारत ने रचा इतिहास मंगल यात्रा शुरू

पृथ्वी की दीर्घवृत्ताकार कक्षा में 20-25 दिन तक चक्कर लगाने के बाद 450 करोड़ रुपए की लागत वाला सुनहरे रंग की छोटी कार के आकार का मंगल यान 30 नवंबर देर रात 12.42 बजे मंगल की 10 महीने की लंबी यात्र पर रवाना होगा। इसके लाल ग्रह की कक्षा में 24 सितम्बर 2014 को पहुंचने और उसकी दीर्घवृत्ताकार कक्षा में चक्कर लगाने की उम्मीद है।

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश), 6 नवंबर (एजैंसी): ध्रुवीय रॉकेट के माध्यम से भारत ने आज सफलतापूर्वक अपना पहला मार्स आर्बिटर मिशन (एम.ओ.एम.) प्रक्षेपित किया जिसके बाद मंगल यान विधिपूर्वक पृथ्वी की नियत कक्षा में प्रवेश कर गया। इसके साथ ही भारत का नाम अंतर ग्रह अभियान से जुड़े चुनिंदा देशों में शामिल हो गया। नए एवं जटिल अभियान प्रारूप के तहत इसरो का पी.एस.एल.वी. सी.-25 यान 1350 किलोग्राम के मंगल यान को 44 मिनट बाद पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश कराने में सफल रहा, जिसका प्रक्षेपण दोपहर 2.38 बजे सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया। इस तरह 450 करोड़ रुपए के अभियान का पहला चरण संपन्न हो गया। मंगल ग्रह की यात्र के दौरान यह 20 करोड़ किलोमीटर की लम्बी यात्र करेगा।

अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में नए क्षेत्र में प्रवेश करने वाले इसरो के मंगल अभियान का उद्देश्य देश की मंगल ग्रह पर पहुंचने की क्षमता स्थापित करना और मंगल पर मीथेन की मौजूदगी पर ध्यान केंद्रित करना है जो मंगल पर जीवन का संकेत देता है। इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने प्रक्षेपण के बाद कहा, ‘पी.एस.एल.वी. सी.-25 यान ने मार्स आर्बिटर को विधिपूर्वक पृथ्वी की दीर्घवृत्ताकार कक्षा में प्रवेश कराया।’ अभियान के नियंत्रण कक्ष से उन्होंने कहा, ‘यह ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी.एस.एल.वी.) का 25वां प्रक्षेपण है और यह नए एवं जटिल अभियान प्रारूप के तहत किया गया है ताकि हम मार्स आर्बिटर यान को पृथ्वी की कक्षा से मंगल की कक्षा में न्यूनतम ऊर्जा में भेज सकें।’ राकेट ने दक्षिण अमरीका के ूपर उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश कराया जिसे दक्षिण प्रशांत महासागर में शिपिंग कार्पोरेशन आफ इंडिया के पोत एस.सी.आई. नालंदा और एस.सी.आई. यमुना पर इसरो के समुद्र आधारित टर्मिनल ने कैद किया। उम्मीद के अनुरूप तीसरे चरण के आगे बढ़ने और चौथे चरण के प्रज्वलन के संकेत अभियान नियंत्रण केंद्र को मिले। इसरो के प्रक्षेपण यान पी.एस.एल.वी. सी.25 का यह ऐतिहासिक प्रक्षेपण 2.38 बजे चेन्नई से करीब 100 किलोमीटर दूर यहां स्पेसपोर्ट से किया गया। इस मौके पर प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री वी. नारायणसामी, भारत में अमरीका की राजदूत नैंसी पावेल, इसरो अध्यक्ष के. राधाकृष्णन और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

आसमान को चीरते तथा आग एवं धुएं के गुबार छोड़ता हुआ यान बादलों के बीच गायब हो गया जबकि मिशन कक्ष में बैठे वैज्ञनिक कम्प्यूटर पर इस दृश्य को देख भावविभोर हो गए और तालियां बजाकर और एक-दूसरे को गले लगा कर बधाई दी। मंगल अभियान नियंत्रण कक्ष में वैज्ञानिक कम्प्यूटर पर प्रक्षेपण के मार्ग पर नजर टिकाए हुए थे। मंगल यान के प्रक्षेपण के कुछ घंटे पहले हालांकि हल्की बूंदाबांदी हुई थी। तनाव भरा क्षण तीसरे चरण के बाद सामने आया जब राकेट प्रज्वलित हो गया और स्क्रीन पर इसके मार्ग पर आगे बढ़ने के संकेत अदृश्य हो गए। राधाकृष्णन ने पहले स्पष्ट किया था कि राकेट करीब 28 मिनट तटानुगमन चरण में होगा जिस क्रम में 10 मिनट पूरी तरह से नहीं दिखाई पड़ने वाला चरण (ब्लाइंड फेज) होगा।

इसरो ने इस अभियान के संदर्भ में नासा के साथ सहयोग किया है जिसके तहत अमरीका के गोल्डस्टोन स्थित जैट प्रोपल्शन लैबोरेट्रीज की सुविधा, मैड्रिड (स्पेन) और कैनबरा (आस्ट्रेलिया) स्थित केंद्रों से अभियान के संदर्भ में संवाद बनाया गया। भारतीय उपग्रह का जीवन अतिरिक्त ईंधन की जरूरत पर आधारित है क्योंकि मार्स आर्बिटर को 10 महीने का लंबा अभियान को पूरा करना है। अभियान की लागत पर आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि एम.ओ.एम. मंगल के लिए सबसे सस्ते एवं कम लागत के अभियान में है। यह अभियान मंगल के सतह से जुड़ी विशेषताओं, आकृति, खनिज विज्ञान और इसके पर्यावरण की स्वदेशी वैज्ञानिक उपकरणों से पड़ताल करेगा। अमरीका ने भी फ्लोरिडा स्थित केप कैनेवरल वायु सेना अड्डे से 18 नवंबर को नासा के मल्टी कार्पोरेशन मिशन ‘मावेन’ का प्रक्षेपण करने का कार्यक्रम बनाया है जो मंगल के वायुमंडल पर बदलाव का अध्ययन करेगा।

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