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सोमवार, मार्च 09, 2015

दुल्हन बनी गरिमा, निवेदिका बन निकली,अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिला त्याग का नया अध्याय जुड़ा


रथ पर सवार माता-पिता ने बेटी को दीक्षा के लिए पहुंचाया, समारोह में 280 लोगों ने किया रक्तदान

डबवाली। अनाज मंडी में गरिमा जैन का दीक्षा समारोह धूमधाम तथा हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। दुल्हन की तरह सजी बेटी की शोभा यात्रा देखकर शहर वासियों की आंखे फटी की फटी रह गई। दीक्षा स्थल पर पहुंचकर बेटी ने संसारिक चोले को उतारकर भगवा चोला पहन लिया। जैन संतों से दीक्षा लेने के बाद वह गुरुवर के साथ चली गई। समारोह में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के जैन श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
रथ में सवार माता-पिता पहुंचे दीक्षा दिलाने
सुबह करीब साढ़े आठ बजे एसएस जैन सभा से शोभा यात्रा की शुरुआत हुई। जैन श्रद्धालुओं की भारी तादाद के बीच दुल्हन के लिबास में गरिमा जैन फूलों से सजे चार घोड़ों वाले रथ में सवार हुई। इसके साथ ही शोभायात्रा दीक्षा समारोह स्थल की ओर प्रस्थान कर गई। शोभायात्रा के आगे-आगे बैंड पार्टी चल रही थी। इसके ठीक पीछे लुधियाना से आए गजराज चल रहे थे। गजराज के पीछे दो घोड़ों वाले रथ में सवार गरिमा की माता संगीता और पिता निर्मल जैन सवार थे। उनके रथ के पीछे त्यागी बेटी का रथ था। शोभा यात्रा में भगवान श्री कृष्ण तथा महावीर स्वामी के जीवन पर आधारित झांकियां शामिल थी। ढोल की थाप पर नाचते हुए लोग आगे बढ़ रहे थे। शोभा यात्रा मुख्य बाजार, कालोनी रोड़, चौटाला रोड़ से होती हुई अनाज मंडी में दीक्षा स्थल पर पहुंची। इससे पूर्व शहर में विभिन्न जगहों पर पुष्प वर्षा करके गरिमा का स्वागत हुआ।
भगवा पहन ली दीक्षा
दीक्षा स्थल पर जैन मुनि सुमति मुनि, सत्यप्रकाश मुनि, विचक्षण मुनि, अचल मुनि के साथ-साथ महासाध्वी शांति, करूणा, श्रेष्ठा, रश्मि, चित्रा, चंदना, कर्णिका, भिलाषणी, प्रतिमा, सुयश, सुचेता, सुव्रत, उदित प्रभा, आराधना, उज्जवल, प्रभा, समीक्षा, समृद्धि, रिद्धि मौजूद थे। मुंडन के बाद भगवा धारण करने वाली गरिमा को जैन संत सुमति मुनि ने मंत्रोच्चारण से दीक्षा दी। दीक्षा पूर्ण होने के बाद गरिमा की गुरु महासाध्वी करूणा ने उसका नाम गरिमा से बदलकर निवेदिका रखा। उन्होंने कहा कि निवेदिका का अर्थ है गुरु को समर्पित। नया नाम देने पर गरिमा ने अनुशासन और मर्यादा का पालन करने का वचन दिया। इससे पूर्व जैन महासाध्वियों ने जाओ छोड़कर बाबुल की गलियां, अखंड तेरी दीक्षा रहे...., नफरत, निंदा, चुगली जो बंदे करते हैं, वो जीते न मरते हैं....भजन गाये। दीक्षा समारोह स्थल पर रक्तदान शिविर लगाया गया। जिसमें 280 लोगों ने रक्तदान किया। मंच का संचालन गौतम जैन तथा कवि रमेश जैन मूनक ने बखूबी निभाया। ध्वजारोहण की रस्म महेंद्र कुमार, सुभाष जैन, इंद्र जैन परिवार ने निभाई। एसएस जैन सभा के अध्यक्ष राजेंद्र जैन सोनू ने आए हुये अतिथियों का स्वागत तथा धन्यवाद किया।
अंगुली छोड़ते मां की आंख भर आई
डबवाली  -अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर डबवाली के इतिहास में महिला त्याग का नया अध्याय जुड़ गया। हजारों लोगों की उपस्थिति में संसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग करके शहर की पच्चीस वर्षीय बेटी गरिमा जैन को साध्वी निवेदिका का नया नाम मिला। एमबीए और अंग्रेजी भाषा में एमए करने वाली गरिमा जैन भगवती दीक्षा ग्रहण करने से पहले लोगों से रूबरू हुई। लोगों से सीधा संवाद करते हुए उनके प्रश्नों के जवाब दिए। उसने वैराग्य जीवन क्यों अपनाया? माता-पिता का दिल कैसे जीता? तमाम सवालों का जवाब हजारों लोगों को दिया। जवाब सुनकर लोगों ने दांतों तले अंगुली दबा ली। बाद में संसारिक चोला उतारकर अपनी गुरु महासाध्वी करूणा का हाथ पकड़कर चल दी।

‘आज का सूरज, आज की सुबह स्पेशल हैं’

गरिमा जैन ने महावीर स्वामी का तीन बार जयघोष करने के बाद लोगों से सीधा संवाद शुरू किया। गरिमा ने कहा कि डबवाली की धर्म धरा पर सतरंगी इंद्रधनुष दिखाई दे रहा है। आज का सूरज, आज की सुबह मेरे लिए स्पेशल है। वर्षों से जिस रूप को धारण करने की इच्छा थी, वह आज पूरी हुई है। जन्म-मरण, कर्मों के बंधनों को तोड़कर मुक्ति मिली है। मैं रात भर बैठकर भगवान से बात किया करती थी। सच्चे ज्ञान की प्राप्ति का बेसब्री से इंतजार था, वह पल आ गया है। यह सब सपना लग रहा है। आज मुझे पवित्र वेश मिला है। इसका आनंद अवर्णनीय है। साध्वी बनी गरिमा ने कहा कि महंगा वस्त्र धारणके लिए पांच-दस करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन प्रभु का वस्त्र धारण करने के लिए दुनियां छोड़नी पड़ती है।

गरिमा ने दिए सवालों के जवाब

गरिमा ने कहा कि लोग मुझसे अकसर प्रश्न करते हैं कि वैराग्य के लिए आप पर किसी का दबाव है? ऐसे लोगों को मेरा जवाब है कि दबाव में किया गया कोई कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। मैं स्वेच्छा से अपने माता-पिता की आज्ञा से संसारिक बंधनों से मुक्त हुई हूं। मेरे पास धन-वैभव की कमी नहीं रही। लेकिन स्व कल्याण तथा परकल्याण की पथिक बनने जा रही हूं। धर्म का यही मार्ग 84 के चक्कर से बाहर निकाल सकता है। गरिमा ने कहा कि वर्ष 2011 में महासाध्वी करूणा जी को गुरु धारण किया था। धर्म की शिक्षा माता-पिता ने ही दी है। गरिमा ने कहा कि दूसरा तथा सबसे अहम सवाल करते हुए लोग पूछते हैं कि सन्यासी मार्ग बेहद कठिन है। उन लोगों को मेरा जवाब है कि जितने तारे गगन में उतने बैरी होए, गुरु कृपा होने से बाल न बांका होए। सवाल करने वाले लोग जब इस मार्ग पर चले ही नहीं, तो उन्हें क्या पता कि सन्यासी मार्ग कठिन है या कांटों भरा है। मुझे यह मार्ग फूलों की शैय्या प्रतीत हो रहा है। गरिमा ने खचाखच भरे आयोजन स्थल में बैठे लोगों को सन्यासी पथ पर चलने के लिए हाथ खड़ा करने के लिए कहा, किसी ने भी हाथ नहीं उठाया।

मां बहुत रोईः

गरिमा ने अपनी मां संगीता रानी को वचन देते हुए कहा कि मेरी मां अंगुली छोड़ते हुए बहुत रोई। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा काम न करना कि दूसरी मां को रोना पड़े।
गरिमा ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि मैं ना रुकूंगी, रस्ते में इक पल, धुन में हैं गुरुसवार, मुझे जाना है भगवान के द्वार, मैं जाऊंगी भगवान के द्वार, न पीछे हटूंगी, दम भी लूंगी मंजिल पर जाकर।



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