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Title: नेशनल सर्टिफिकेट नीलाम बोली पांच हजार रुपये लगाई सात हजार रुपये में बेचना चाहता हूं- महावीर
Author: Young Flame
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फिटर रेहड़ा चलाने को मजबूर हैंडबॉल का ‘महावीर’  दो बार नेशनल, 14 बार स्टेट खेल चुके खिलाड़ी ने नीलामी के लिए रखी उपलब्धियां #dabwa...
फिटर रेहड़ा चलाने को मजबूर हैंडबॉल का ‘महावीर’

 दो बार नेशनल, 14 बार स्टेट खेल चुके खिलाड़ी ने नीलामी के लिए रखी उपलब्धियां

#dabwalinews.com
 हैंडबॉल का ‘महावीर’ नेताओं की उदासीनता के चलते फीटर रेहड़ा चलाने को मजबूर है। दो बार नेशनल तथा 14 बार स्टेट खेल चुका यह खिलाड़ी अपनी खेल उपलब्धियां नीलाम करने जा रहा है। बुरी तरह से टूट चुके इस खिलाड़ी का कहना है कि देश में प्रतिभा का नहीं, पैसे तथा राजनीतिक पहुंच रखने वालों का सम्मान होता है
हम बात कर रहे हैं गांव गोरीवाला के हैंडबॉल खिलाड़ी महावीर प्रसाद की। दोनों हाथों से गोल करने की क्षमता रखने वाला गजब का यह खिलाड़ी नेशनल गेम्स में हरियाणा टीम का प्रतिनिधित्व कर चुका है। 1992 में जम्मू एंड कश्मीर सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ यूथ सर्विसेज एंड स्पोर्ट्स द्वारा आयोजित सब जूनियन नेशनल स्कूल गेम्स में हरियाणा ने महावीर की कप्तानी में हिस्सा लिया था। उस समय उसकी उम्र महज 14 वर्ष थी। 1997-98 में भोपाल में आयोजित नेशनल स्कूल गेम्स के अंडर-19 में इस खिलाड़ी ने दूसरी बार जगह बनाई। इसके अतिरिक्त हिसार, करनाल, सिरसा, कैथल, यमुनानगर, अंबाला, झज्जर में स्टेट खेला।
महावीर का आरोप है कि राजनीतिकों ने उसकी प्रतिभा से न्याय नहीं किया। वर्ष 2003-04 में जंगलात महकमे में चपरासी की नौकरी मांगने के लिए राष्ट्रीय खिलाड़ी को एक सफेदपोश के आगे गिड़गिड़ाना पड़ा। सफेदपोश ने जवाब दिया कि पहले फिजिकल पास करके आओ। सपना टूटने के बाद परिवार के आर्थिक हालातों ने खेल का मैदान छुड़वा दिया। वर्ष 2006 में फीटर रेहड़ा के लिए बैंक से 25 हजार रुपये लोन लिया। दो दोस्तों से बिना ब्याज के पचास हजार रुपये उधार लिए। बैंक तथा एक दोस्त से लिया कर्ज चुकता कर दिया। एक दोस्त का कर्ज अभी भी सिर पर है।गुरुजनों ने खूब किया प्रयास
राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने के लिए महावीर के पास एक पाई तक नहीं थी। एसएस अध्यापक श्याम लाल ने 1992 में उसे 180 रुपये दिए। प्रतियोगिता में हरियाणा को चौथा स्थान दिलाकर वाहवाही लूटकर आए इस खिलाड़ी ने शेष बचे 80 रुपये अपने गुरु को लौटा दिए। 1997 में भी पुन: श्याम लाल ने भोपाल जाने के लिए होनहार खिलाड़ी को 400 रुपये दिए। इनमें से 200 रुपये अध्यापक को लौटा दिए। अध्यापक ने 200 रुपये में स्कूल वर्दी खरीदकर महावीर को पहनाई। 11वीं में गांव गंगा में एडमिशन लिया। बीईओ संत कुमार बिश्नोई ने उसे स्कूल वर्दी लेकर दी। पिता गिरदावर लाल की मौत के बाद पारिवारिक स्थिति बेहद खराब हो गई। पुन: स्कूल की ओर मुंह नहीं किया। यहां तक कि 11वीं की परीक्षा परिणाम जानने का प्रयास नहीं किया।

भतीजे-भतीजियों को पढ़ा रहा
36 वर्षीय महावीर अब अपने भतीजे-भतीतियों को पढ़ाकर अपना सपना पूरा कर रहा है। महावीर के अनुसार माली हालत को देखते हुए उसने शादी भी नहीं करवाई।
मैं खिलाड़ी रहा, इस बात का मुझे ताउम्र पछतावा रहेगा। जंगलात महकमा में नौकरी के बेहद चांस थे। मेरा नाम वेटिंग में था। राजनीतिक सिफारिश तथा रिश्वत में देने के लिए पैसे नहीं थे। घर की स्थिति सुधारने के लिए दिहाड़ी की। महज पांच सौ रुपये के लिए किसी दूसरे नाम पर खेला। मैंने अपने नेशनल सर्टिफिकेट नीलाम कर रखे हैं। किसी ने बोली पांच हजार रुपये लगाई है, पर मैं इसे सात हजार रुपये में बेचना चाहता हूं।
महावीर, नेशनल प्लेयर, हैंडबॉल
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