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बुधवार, अक्तूबर 19, 2016

डबवाली का बेटा शाद कला के माध्यम जोड़ राह है दिलों को दिलों से



#dabwalinews.com
संजीव शाद रंग मंच का एक ऐसा कलाकार है जो अपनी कला के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति के साथ जोड़ने में लगा है। वह जब अपनी बुलंद आवाज में मंच से कहता है कि ‘वो खेत बाग और मचान भूल गए, हम अपने गांव का कच्चा मकान भूल गए, चार दिन कहीं गए थे विदेश, लौट कर आए तो अपनी ही जुबान भूल गए तो दर्शकों की तालियों की गूंज ही सुनाई पड़ी | संजीव शाद रंग मंच का एक स्थापित कलाकार है। शाद का मानना है कि इंटरनेट व केबल टीवी के इस युग में भी रंग मंच अपना ही एक महत्व है। रंग मंच समाज में जागरूकता लाने का एक सशक्त माध्यम है। रंग मंच पर एक कार्यक्रम की सफलता-असफलता का निर्णय दर्शक तुरंत कर देते हैं। टीवी पर री-टेक होने के कारण अभिनय को संवारा जा सकता है लेकिन रंगमंच के कलाकार की क्षमता उसी समय पता चल जाती है। ब¨ठडा में चल रहे सरस मेले में उनको विशेष तौर पर मंच संचालन के लिए बुलाया गया है। 1 शाद की यह क्षमता लोगों ने बार-बार देखी है। विशेष बात यह है कि शाद ने रंग मंच को मनोरंजन के पारंपरिक विषयों तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उसे ज्वलंत समस्याओं के साथ जोड़कर उसे समाज सुधार का माध्यम भी बनाया है। संजीव शाद को बचपन से ही अभिनय से लगाव था। यही लगाव उन्हें नाटकों व रंग मंच तक ले आया। स्कूल में वह अपने सहपाठी को बच्चों को साथ लेकर नाटक तैयार करते और उन्हें 15 अगस्त, 26 जनवरी अथवा अन्य किसी खास मौके पर होने वाले समारोह में मंचित करते।
संजीव शाद को लगता है कि नाट्य कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कोई विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे। वह उम्मीद करते हैं कि सरकार इस कला को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में नाट्य कला को एक अलग विषय के रूप में शामिल करे।जासं, ब¨ठडा : संजीव शाद रंग मंच का एक ऐसा कलाकार है जो अपनी कला के माध्यम से लोगों को अपनी संस्कृति के साथ जोड़ने में लगा है। वह जब अपनी बुलंद आवाज में मंच से कहता है कि ‘वो खेत बाग और मचान भूल गए, हम अपने गांव का कच्चा मकान भूल गए, चार दिन कहीं गए थे विदेश, लौट कर आए तो अपनी ही जुबान भूल गए तो दर्शकों की तालियों की गूंज ही सुनाई पड़ी।
संजीव शाद रंग मंच का एक स्थापित कलाकार है। शाद का मानना है कि इंटरनेट व केबल टीवी के इस युग में भी रंग मंच अपना ही एक महत्व है। रंग मंच समाज में जागरूकता लाने का एक सशक्त माध्यम है। रंग मंच पर एक कार्यक्रम की सफलता-असफलता का निर्णय दर्शक तुरंत कर देते हैं। टीवी पर री-टेक होने के कारण अभिनय को संवारा जा सकता है लेकिन रंगमंच के कलाकार की क्षमता उसी समय पता चल जाती है। ब¨ठडा में चल रहे सरस मेले में उनको विशेष तौर पर मंच संचालन के लिए बुलाया गया है। 1 शाद की यह क्षमता लोगों ने बार-बार देखी है। विशेष बात यह है कि शाद ने रंग मंच को मनोरंजन के पारंपरिक विषयों तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उसे ज्वलंत समस्याओं के साथ जोड़कर उसे समाज सुधार का माध्यम भी बनाया है। संजीव शाद को बचपन से ही अभिनय से लगाव था। यही लगाव उन्हें नाटकों व रंग मंच तक ले आया। स्कूल में वह अपने सहपाठी को बच्चों को साथ लेकर नाटक तैयार करते और उन्हें 15 अगस्त, 26 जनवरी अथवा अन्य किसी खास मौके पर होने वाले समारोह में मंचित करते। संजीव शाद को लगता है कि नाट्य कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से कोई विशेष प्रयास नहीं किए जा रहे। वह उम्मीद करते हैं कि सरकार इस कला को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में नाट्य कला को एक अलग विषय के रूप में शामिल करे।

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