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Title: 350 साल के कछुए की मौत, लोगों ने रीति-रिवाज से किया अंतिम संस्कार
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रायपुर।   राजधानी के सरोना तालाब में एक 350 साल के कछुए की मौत हो गई। इसकी लंबाई करीब साढ़े पांच और चौड़ाई 3 फीट के करीब थी। करीब 100 किलो...
रायपुर।  राजधानी के सरोना तालाब में एक 350 साल के कछुए की मौत हो गई। इसकी लंबाई करीब साढ़े पांच और चौड़ाई 3 फीट के करीब थी। करीब 100 किलो वजनी इस कछुए को 8 लोगों ने मिलकर तालाब से बाहर निकाला। लोगों ने पूरे रीति-रिवाज से मंदिर के समीप कछुए का अंतिम संस्कार कर दिया। भविष्य में यहां कछुए की समाधि बनाई जाएगी।
- स्थानीय लोगों के मुताबिक उनकी चार पीढ़ियों से इस कछुए के बारे में सुनते आ रहे हैं। दादा-परदादा बताते थे कि उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया था कि तालाब में एक बढ़ा कुछुआ है। यहां के लोग इसकी पूजा करते थे। जब महिलाओं को ये दिख जाता था तो वह इसे बहुत शुभ मानती थीं।
- तालाब के केयर टेकर ही कछुए का ख्याल रखते थे। ये काफी दिनों से बीमार चल रहा था। सोमवार को लोगों ने देखा कि पानी के ऊपर दिख रहे कछुए में कोई हलचल नहीं है। तलाब में जाकर देखा गया तो उसकी मौत हो चुकी थी। 78 किलो वजनी इस कछुए को बाहर निकाला गया और पास स्थित शिव मंदिर परिसर में पूरे सम्मान के साथ दफना दिया गया।
वन विभाग को नहीं दी जानकारी
-डीएफओ फॉरेस्ट एनबी गुप्ता ने बताया कि स्थानीय लोगों ने वन विभाग को सूचित नहीं किया और दफना दिया।
- मौके पर वन विभाग की टीम रवाना हो गई है। पहले कछुए के मौत की जानकारी ली जाएगी।
- फिर तय किया जाएगा कि उसे कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम कराना है कि नहीं।
- हालांकि मामला आस्था से भी जुड़ा हुअा है। ये कछुआ वहां मौजूद प्रचीन शिव मंदिर का पहरेदार भी माना जाता था।
इस तालाब में कछुए के आने की ये है कहानी
- मंदिर और तालाब के केयर टेकर जनकर सिंह ठाकुर ने बताया कि इनके पूर्वजों ने ये मंदिर और तालाब बनवाया है।
- करीब 350 साल पहले जब पूर्वजों के संतान नहीं हो रही थी तक एक साधू ने कहा था कि यहां एक तालाब खुदवाओ और उसके किनारे शिव जी का मंदिर बनवाओ।
- तालाब में कछुए और मछलियां पालो। ऐसा करने के बाद उनकी संताने हुईं और ये पीढ़ी आज भी चल रही है।
- उस वक्त तालाब में ये कछुआ छोड़ा गया था। आज इसका पूरा परिवार है।
- उम्र ज्यादा होने के बाद ये अक्सर बीमार रहता था। इसबार गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई और इसने दम तोड़ दिया।
- लोग इस कछुए को पवित्र मानते थे और इसके लिए तालाब की पूरी मछलियां छोड़ दी थी।
- कोई भी इस तालाब से मछली नहीं पकड़ता था। मंदिर में दर्शन के बाद इसके दर्शन के लिए महिलाओं का जमावड़ा लगता था।
सास-बहू के नाम से हैं तालाब

- पार्षद सोमन लाल ठाकुर ने बताया कि सरोना तालाब अपनी अलग धार्मिक पहचान बनाया हुआ है। यहां पर सास-बहु नामक दो तालाब हैं, जो एक-दूसरे से एक ही स्त्रोत से जुड़े हुए हैं।
- ऐसी मान्यता है कि, बरसात के दिनों में जब इन तालाबों में बाढ़ आती है, तब ये दोनों तालाब मनुष्यों की भांति एक-दूसरे की मदद करते हैं।
- साथ ही इन तालाबों में मछलियों और कछुओं को नहीं पकड़ा जाता और ना ही उनका भक्षण किया जाता है। सरोना का यह स्थान प्राचीन शिव मंदिर के कारण पूरे क्षेत्र में विख्यात है।
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