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Title: खतरनाक राह पर चल रही युवा पीढ़ी, सोशल मीडिया से हो रहे प्रभावित
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नरेश अरोड़ा संयुक्त  परिवार लगातार टूटते जा रहे हैं। कभी एक साथ चूल्हें के पास जमीं पर बैठकर दो वक्त की ताजा रोटी का लुत्फ पूरे परिव...

नरेश अरोड़ा


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संयुक्त  परिवार लगातार टूटते जा रहे हैं। कभी एक साथ चूल्हें के पास जमीं पर बैठकर दो वक्त की ताजा रोटी का लुत्फ पूरे परिवार के साथ उठाया जाता था और घरेलू समस्याओं पर चर्चा करने के साथ-साथ रिश्तेदार व भाई-बहनों के सुख दुख सांझें किए जाते थे। लेकिन फिर समय ने करवट ली और चूल्हें से उठकर डायनिंग टेबल पर आ गए यहां तक तो ठीक-ठाक था लेकिन धीरे-धीरे डायनिंग से भी अब रिश्ता टूटने लगा हैं और नई पीढ़ी अपना खाना बैडरूम में अकेले में लेकर जाने लगे हैं। यह सब क्यों हो रहा है कहां कमी आ रही परिवार के प्यार में, क्यों टूट रहे हैं परिवार । इसका मुख्य कारण सोशल मीडिया का कुप्रभाव कहें या फिर मां-बाप से बच्चों को मिलने वाले संस्कारों की कमी कि आज की युवा पीढ़ी अपने पथ से भटकती हुई प्रतीत हो रही है। गुस्से से लबरेज इस पीढ़ी में संयम कम होता जा रहा है। शायद यह खान-पान का भी असर है कि छोटी-छोटी बात पर ही युवा पीढ़ी पूरी तरह से आग - बबूला हो जाती है और बिना कुछ सोचे समझे ऐसे कदम उठा रही है कि जिससे मां-बाप को संताप झेलना पड़ता है। बीते दिवस एक ऐसा ही मामला पंजाब  व हरियाणा के साइबर सिटी में सामने आया जिसमें पहले दो बहनों ने घर से भागने के लिए योजनागत तरीके से अफवाह फैला दी कि सेल्फी लेते वक्त दोनों की नहर में गिरकर मौत हो गई है जबकि वे पहुंच गईं दिल्ली। वहां जब उनके पास पैसे खत्म हो गए तो वह अपना मोबाइल फोन बेचकर अमृतसर में अपने घर पहुंची। दरअसल दोनों लड़कियां फिल्मी कहानियों की तरह रातोंरात स्टार बनने के लिए नौकरी की तलाश में घर से भागी थीं लेकिन जब उन्हें हकीकत के थपेड़ों का सामना करना पड़ा तो उन्हें सिवाय घर के रास्ते के कोई और रास्ता दिखाई नहीं दिया।
यह सब इसलिए हो रहा है कि वर्तमान में इंसान की जिन्दगी पैसों की दौड़ में इतनी तेज भागने लगी है कि उसके पास अपने बच्चों के पास बैठकर बात करने का भी वक्त नहीं है। एकल परिवारों में मां-बाप के बाहर नौकरी पर जाते ही बच्चे खुद को घर पर अकेला महसूस करते हैं और उनके खाली दिमाग में कई तरह की खुरापात आने लगती हैं। यही कारण है कि बच्चों में गुस्सा बढ़ रहा है और किसी कक्षा में फेल हो जाने पर वह मां-बाप की जरा सी डांट पर खुद को फंदे पर लटकाकर परिजनों को जिन्दगी भर रोने के लिए छोड़ जाते हैं। पहले संयुक्त परिवार होते थे तो बच्चे घरों में बड़े-बुजुर्गो से संस्कार सीखते थे और उनमें सहनशीलता होती थी। परंतु आज की पीढ़ी पूरी तरह से सोशल मीडिया और टीवी में डूबी हुई है। जो वह वहां से सीखती है उसे ही अपने जीवन में अपनाने की कोशिश करती है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि बच्चों के इस तरह के आचरण के लिए कहीं न कहीं उनके माता-पिता भी दोषी हैं। वह अपने बच्चों को मोबाइल तो थमा देते हैं परंतु यह चेक करना भूल जाते हैं कि वह मोबाइल का सदुपयोग कर रहे हैं या फिर दुरुपयोग। परिजनों को चाहिए कि वह बच्चों के लिए समय निकालें, उनके साथ बैठें उन्हें उनके जीवन में अच्छी व बुरी बातों का बोध कराएं। बच्चों की बात को सुनें और उनकी समस्याओं का निवारण करें। कुल मिलाकर खतरनाक रास्ते पर चल रही है युवा पीढ़ी
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