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Title: डेरा विवाद :- सब कुछ सामान्य मगर थमी-थमी सी जिंदगी
Author: Dabwalinews.com
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#dabwalinews.com  डबवाली । शहर में चार दिन लगे कफ्र्यू के बाद पिछले दो दिनों से जनजीवन तो सामान्य हो गया है, लेकिन कितना सामान्य हुआ है...
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डबवाली ।
शहर में चार दिन लगे कफ्र्यू के बाद पिछले दो दिनों से जनजीवन तो सामान्य हो गया है, लेकिन कितना सामान्य हुआ है इस पर गौर फरमाने की बेहद आवश्यकता है। बाजारों में दुकानें खुली हैं लेकिन ग्राहक नहीं हैं, रेहडिय़ां लगी हैं लेकिन सामान खरीदने वाले गायब हैं, रिक्शा चालक की सूनी आंखे सवारी ढूंढ रही है लेकिन कोई नहीं बैठ रहा बसें और अन्य वाहन सडक़ों पर दौड़ तो रहे हैं लेकिन सबके चेहरों  से मुस्कान और सक्रियता गायब है।
रोजी रोटी को तरस रहे लोंगों के मन में अनेक सवाल उठ रहे हैं और एक ही सवाल कर रहे हैं कि किसने किया, क्ंयू किया, कब किया जिसका सजा आम आदमी को भुगतनी पड़ रही है। ऐसे बहुत से सवाल आमजन के मस्तिष्क में हिलौरे ले रहे हंै और पूछ रहें कि आखिर उनका क्या दोष था?
चार दिन तक घरों में दुबके लोगों की दिनचर्या पटरी से उतर चुकी हैं और स्वयं को दिलासा देने के इलावा और कुछ भी नहीं कर पा रहे। ‘डबवाली न्यूज़ ’ के संवाददाता ने ताजा कमाने वाले, ताजा खाने वालों के विभिन्न वर्गों से बात की तो परेशानियां का सैलाब ही उमड़ा देखा गया आमजन में।
चन्ने चबाकर गुजारी रातें
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मूल रूप से यूपी के निवासी रिक्शा चालक चन्द्र शेखर ने बताया किया कि कफ्र्यू हटने के बाद पिछले दो दिनों से बठिंडा चौक पर रिक्शा लेकर खड़ा हूं लेकिन दोपहर तक मात्र 40 रूपये ही कमा पाया हूं। सवारी न मिलने के कारण परिवार की रोजी रोटी तक चलाना मुश्किल हो गया है। चन्द्र शेखर ने बताया कि बंद के दौरान उन्हें न दूूध मिला न राशन क्योंकि जेब में कुछ था ही नही जिसके कारण दो दिन तक परचून की दुकान से चने खाकर और पानी पीकर दो रातें गुजारने को मजबूर हुए हैं।


भूट्टों के सहारे गुजारे दो दिन
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बठिंडा चौक पर रेहड़ी लगाकर भुट्टे बेचने वाले रमेश की कहानी तो और भी चौकाने वाली है। रमेश ने बताया कि दिन भर जितना कमाते हैं उसी से घर का चूल्हा चलता है। बचत के नाम पर कुछ भी पास नहीं था और चार दिन तक रेहड़ी नहीं लगा पाया और न ही मंडी से भुट्टे मिले। परचून की दुकान चलाने वाले दुकानदार ने राशन उधार देने से मना कर दिया और न दूध मिला न राशन बच्चों को बहला फूसलाकर और बचे हुए भुट्टों के सहारे दो दिन का समय निकाल पाए। दो दिन तो इधर-उधर से खाने का जुगाड़ कर लिया लेकिन दो दिन फाके काटने को मजूबर होना पड़ा। रमेश ने बताया कि लोग तो आ जा रहे हैं लेकिन भुट्टे के शौकिन अभी भी दिखाई नहीं पड़ रहे।
नहीं जा पाए गलियों और बाजारों में
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शहर की हर गली और बाजार से कूड़ा बीन कर अपना व अपने परिवार का लालन-पालन करने वाले हर्ष नगर निवासी शक्ति, विशाल, समीर बम्बर आदि से बात की तो उन्होंने बताया कि कफ्र्यू के दौरान वे लोग घर से नहंी निकल पाए जिसके कारण प्लास्टिक, बोतल व अन्य सामान एकत्रित नहीं कर पाए और लाचार होकर घरों में दुबके रहे लेकिन खाने-पीने की वस्तुएं प्रयाप्त मात्रा में  नहीं मिल पाई। उक्त चारों ने बताया कि वे लोग शहर के कोने-कोने से बेकार पड़ी वस्तुओं को एकत्रित कर हर्ष नगर में स्थित एक व्यक्ति को बेचते हैं और इसके बदले उन्हें सौ-दो सौ रूपये मिल जाते हैं लेकिन बंद के दौरान वे अपने कार्य को अंजाम नहीं दे पाए। उन्होंने बताया कि जो थोड़ा बहुत जमा किया हुआ था वह चार दिन में खाने पीने की वस्तुएं खरीदने में समाप्त हो गया। घर की महिलाएं भी यही काम करती हैं लेकिन वे भी बाहर नहीं जा पाई जिसके चलते भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि चार दिन तो यूं ही बंद रहे तो वहीं अब दो दिन से बरसात हो जाने के कारण प्लास्टिक व अन्य सामान तलाशने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
ऑटो चालकों को नहीं मिल रही सवारियां
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कफ्र्यू हट गया है,आवागमन सुचारू हो गया है लेकिन सवारियां नहीं मिल पा रही जिसके कारण अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यह कहना है ऑटो चालक ओम प्रकाश, राजू, प्रमोद, दर्शन व मिंटू का। उन्होंने बताया कि सुबह 6 बजे से चौक में ऑटो लेकर खड़े हंै लेकिन दोपहर तक मात्र 50 रूपये ही कमा पाए हैं। उन्होंने बताया कि पंजाब बस अड्डे की ओर जाने वाली सवारियां तो जरूर कुछ मिल रही हैं लेकिन अन्य क्षेत्रों में जाने के लिए सवारियां दिखाई तक नहीं पड़ रही। ऑटो चालकों ने बताया कि चार दिन बंद रहने के कारण सारा सिस्टम गड़बड़ा गया है। ऑटो रिक्शा अधिक हैं और सवारियां हैं नहीं ऐसे में गाड़ी की किस्त व किराया तक अदा करना मुश्किल हो गया है। उन्होंने बताया कि यह चार दिन और रातें उनके लिए बेहद मुश्किल भरे थे। उन्होंने इन चार दिनों को अपने लिए कहर बताया तो वहीं रातों को काली रात की संज्ञा दी। अभी भी चिंता की लकीरें उनके माथे पर देखी जा सकती हैं और आशंकित है कि न जाने सामान्य होने में और कितने दिन लगेंगे।
सरकार से सवाल:इनकी कौन करेगा भरपाई
डबवाली। सवाल बहुत ही बड़ा है लेकिन इस सवाल का जवाब न तो सरकार के पास है और ही प्रशासन के पास। कोर्ट ने ये तो स्पष्ट कर दिया है कि दंगे के दौरान जो भी नुकसान हुआ है उसकी भरपाई दंगाईयों और डेरे से की जाए, लेकिन एक दक्ष प्रशन यह है कि उन चार दिनों में जिन व्यापारियों, दुकानदारों व अन्य प्राईवेट संस्थानों के व्यापार पर जो असर पड़ा है उसकी भरपाई कौन करेगा? इससे भी बड़ा सवाल एक और है कि जिन लोगों के पास इन चार दिनों के लिए राशन तक नहीं था और फाके काटने पड़े तथा मानसिक प्रताडऩा का सामना करना पड़ा उसकी भरपाई कौन करेगा? इसके अतिरिक्त लगातार चार दिनों तक बंद रहने के कारण अगामी दिनों में जो असर दिखाई दे रहा है उसकी भरपाई कौन करेगा? ग्रामीण इलाकों से लोग शहर में नहीं आ रहे हैं तो वहीं शहरी लोग भी अपने कामकाज को संभालने में जुट गए हैं और खरीददारी के लिए महिलाएं भी घर से अभी तक बाहर नहीं आ रही है। जिसके कारण दुकानदार हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। शिक्षण संस्थान बंद रहे विद्यार्थियों के अध्यन पर असर पड़ा उसकी भरपाई कौन करेगा? इस तरह के अनेक प्रश्न आज भी मुंह बाएं खड़े हैं।
नरेश अरोड़ा की विशेष रिपोर्ट
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