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Title: थर्ड जेंडर का कहां मिले उनके अधिकार
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#dabwalinews.com  सरकार योजनाएं बनाती है लेकिन उसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता। इसका मुख्यकारण अफसरशाही का सरकार पर हॉवी होना है।...
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 सरकार योजनाएं बनाती है लेकिन उसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाता। इसका मुख्यकारण अफसरशाही का सरकार पर हॉवी होना है। अफसरशाही इस कद्र हॉवी हो चुकी है कि उन पर न तो सरकार के आदेशों का कोई असर होता है और  न ही न्यायपालिका का जिसके कारण अनेक योजनाएं अधर में ही दम तोड़ देती है और सरकार की छवि को नुकसान पहुंचता है। अप्रैल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों को समान अधिकार देने पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था और  इस फैसले के तहत पुरुष-महिला के अलावा किसी भी सरकारी दस्तावेज में तीसरा खांचा किन्नरों के लिए रखने का आदेश पारित किया था। इसके अतिरिक्त लिंग बताने के लिए या जेंडर बताने के लिए तीसरी कैटेगरी भी होगी, जो केंद्र और राज्य सरकारों को लागू करना होगा। सर्वोच्य न्यायालय ने यह साफ कर दिया था कि  इस आदेश के बाद महिला, पुरुष और किन्नर नाम की तीन कैटगरी होंगी। इस फैसले के बाबत सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस भी दिया था। यही  नहीं अक्तूबर 2012 में नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी और अपील की थी कि देश में किन्नरों को समान अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। इसके तहत मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड के अलावा शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों आदि में तीसरे वर्ग को शामिल करने और शौचालयों में जाने की अनुमति जैसी मांग भी रखी थी ।
सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पारित किए जाने के बावजूद भी र्थर्ड जेंडर को वो सभी सुविधाएं नहीं मिल पा रही जिन्हें तुरंत प्रभाव से लागू करने की बात कही गई थी। थर्ड जेंडर का दर्जा मिलने के बाद किन्नर समुदाय ने नाच-गाकर पूरे देश में खुशी मनाई थी लेकिन वह खुशी सरकार व सरकारी विभागों की अदासीनता के कारण परवाण नहीं चढ़ पाई। आज भी किन्नर वर्ग को अनेक सुविधाओं से वंचित रखा जा रहा है। आईडी प्रूफ के लिए प्रयोग होने वाले चंद दस्तावेजों को छोडक़र अधिकतर दस्तावेज नहीं बनाए जा रहे जिसके कारण थर्ड जेंडर की श्रेणी में आने वाले मायूस और लाचार हैं।
बैंक में खाता खुलवाने के लिए पैन कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है लेकिन डबवाली शहर व आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले किन्नर समुदाय के लोग इसके लिए दर-दर की ठोकरे खा रहे हैं। लाख प्रयासों के बावजूद भी पैन कार्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को बनवाने के प्रयास विफल साबित हो रहे हैं। जबकि इसके ठीक विपरीत ट्रांसजेंडर्स को बैंक खाता खोलने और बैंक सेवाओं का उपयोग करने में सहायता देने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे अपने सभी फॉर्म और प्रार्थना प्रपत्रों में ‘तीसरे लिंग’का कॉलम जोड़ें। आरबीआई ने कहा कि उसके संज्ञान में आया है कि ट्रांसजेंडर्स को बैंक खाता खोलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि खाता खोलने और अन्य फॉर्म में उनके लिए कोई प्रावधान नहीं है। थर्ड जेंडर का पैन कार्ड न बनाए जाने के कारण बैंक सुविधा प्राप्त करने में नाकाम साबित हो रहे हैं। इससे सरकार की मंशा पर भी सवाल उठना स्वभाविक है। सरकार व संबंधित विभाग सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की खुलकर धज्जियां उड़ा रहे हैं।

शहर की थर्ड जेंडर बिंदिया महंत से विषय पर बात की तो उन्होंने बताया कि लगभग 15 वर्ष पूर्व उनका पैन काड बन गया था लेकिन उस पर बिंदिया महंद के स्थान विद्या महंत अंकित कर दिया गया।
अब जब नाम ठीक करवाने का प्रसास किया तो यह कार्य सिरे नहीं चढ़ पा रहा। अन्य साथियों का पैन कार्ड न बनाए जाने पर उन्होंने बताया कि अनेक बार उनके साथ इस विषय को लेकर संबंधित अधिकारियों व अन्य लोगों के पास चक्कर लगा रहे हैं लेकिन इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल पा रहा। बिंदिया महंत का कहना है कि बैंक में खाता खुलवाने के लिए पैन कार्ड की जरूरत है लेकिन नहीं बन पा रहा, जिसके कारण बैंक में खाता खुलवाने में पूरी तरह से असमर्थ हैं। उन्होंने कहा कि इस विषय को लेकर अपने अन्य सार्थियों के साथ वे उच्चाधिकारियों से मुलाकात कर कारण जानने का प्रयास करेंगी।
 पैन कार्ड बनवाने में सहयोग करने वाले धर्मपाल मित्तल से बात की तो उन्होंने बताया कि र्थर्ड जेंडर समुदाय को पैन कार्ड की सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए बेशक सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी दस्तावेजों में तीसरा खांचा किन्नरों के लिए रखने के आदेश दिए थे लेकिन संबंधित विभाग द्वारा इस ओर कोई कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने बताया कि न किसी फार्म में यह खांचा छोड़ा गया है और न ही ब्लॉक अथवा नैट पर इस तरह की कोई जानकारी उपलब्ध है। ऐसे में पैन कार्ड बनवाने के इच्छुक थर्ड जैंडर का पैन कार्ड बनवाने में दिक्कत आ रही है। धर्मपाल मित्तल ने बताया कि उनके पास इस तरह का केवल एक मात्र ही केस आया था लेकिन सरकार व संबंधित विभाग द्वारा कोई कॉलम उपलब्ध न करवाए जाने के कारण वह इस कार्य को संपन्न करवाने में पूरी तरह से असमर्थ है। उन्होंने कहा कि फिर भी वे प्रयास कर रहे हैं शायद को रास्ता निकल आए। 
 दबे-कुचले और हेय की दृष्टि से देखे जाने वाले किन्नर समाज को समाज की मुख्यधारा में लाने वा समान अधिकार दिलवाने के लिए डेरा सच्चा सौदा द्वारा अहम भूमिका अदा की गई थी और किन्नर समाज को थर्ड जेंडर श्रेणी में शामिल करने के लिए आवाज बुलंद की गई थी। इसके लिए डेरा द्वारा न्यायालय मे ंयाचिका भी दायर की थी और फैंसला किन्नर समुदाय के हक में आने के बाद डेरा में भी खुशियां मनाई गई थी।


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