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रविवार, जुलाई 23, 2017

व्यापारी नाराज, किसान असंतुष्ट, युवा निराश, कर्मचारी बेलगाम और आमजन बेबस फिर भी सरकार को गुमान


नरेश अरोड़ा
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से लेकर पार्टी का हर छोटा बड़ा नेता सरकार की उपलब्धियों का बखान कर रहा हैं। यहां तक कि छुटभैया नेता तो प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता का बखान हर मंच पर बढ़ चढ़कर कर रहे हैं लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है और आमजन के दिमाग से अब भाजपानीत सरकार का खुमार उतरने लगा है। यह और बात है कि अभी आमजन को कोई और विकल्प दिखाई नही दे रहा। जिस प्रकार नेताओं की कार्यशैली का बखान किया जा रहा है वास्तव में धरातल पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका गुणगान किया जा सके। लेकिन मनोहर सरकार के अस्तित्व में आने से पूर्व अनेक ऐसी घोषणाएं की थी जो आज भी केवल घोषणाएं ही रहने का आभास करवा रही है।
पारदर्शी शासन व्यवस्था के दावे अकसर खट्टर सरकार करती रही है। सीएम विंडों जैसी योजना बहुत बड़ा बदलाव ला सकती थी बशर्तें सरकारी अमला मुस्तैदी दिखाता। सरकार दावा कर रही है कि दो दर्जन विभागों की 170 सेवाओं को पारदर्शिता के लिए ऑनलिया किया गया है। बहरहाल साक्षर लोगों को ही पंचायतों में पहुंचने की पहल को सुप्रीम कोर्ट ने सराहा। इसके बावजूद पंजाब के कर्मचारियों के बराबर वेतन, सेवानिवृति की उम्र साठ साल करने, समान काम के लिए समान वेतन,एसवाईएल, हांसी-बुटाना नहर में हरियाणा के हिस्से का पानी लाने जैसे वायदे पूरे नहीं हुए हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में वाड्रा जमीन मुद्दे को राज्य स्तर पर भुनाने की कोशिश की गई लेकिन हुआ क्या खोदा पहाड़ निकली चुहिया वाली कहावत साबित हुई। सीएसलयू एवं लाईसेंस देने में गड़बडिय़ों की जांच के लिए जिस ढींगरा आयोग का गठन किया था उसकी रिपोर्ट धूल चाट रही है। इसी तरह की स्थिति जाट आंदोलन के दौरान हिसंा-आगजनी में पुलिस प्रशासन के अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए गठित की गई प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट भी है। इतना जरूर है कि सरकार लिंग अनुपात के मुद्दे पर संवेदनशील बनी, खुद प्रधानमंत्री ने बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओं आंदोलन की शुरूआत हरियाणा से की मगर आज बेटियां राज्य में खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही है। गांव पड़ौस के स्कूल में आने में उन्हें डर लगता है। स्कूल अपग्रेड करने के लिए लड़कियों द्वारा शुरू किए गए आंदोलन ने देश में जागरूकता पैदा की। इसके बावजूद भी सरकार अपना गुणगान करने में लगी है।
सरकार भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा करते नहीं थक रही है यदि सरकार आने आस-पास नजर दौड़ाए तो बहुत कुछ नजर आ जाएगा। गाय, गीता और सरस्वती के एजेंडे के साथ आगे बढ़ी सरकार ने तमाम तरह की घोषणाएं करके बदलाव की सरकार का होने का दावा किया मगर ठोस सत्य अनेक सवाल लिए खड़ा है। सरकार पर अनुभवहीनता के आरोप लगते रहते हैं तो वहीं नौकरशाही के वर्चस्व की बात भी होती है। राजनीति की मुख्यधारा से अलग हुए तबके के जातिगत आंदोलन के जख्मों की टीस अभी बाकी है। हरियाणा सरकार का कार्यकाल संतोष जनक नहीं कहा जा सकता क्योंकि प्रदेश के लोग मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं। विकास कार्य न होने और सरकार द्वारा अनेक क्रियाक्लापों में आमजन को उलझाए रखने के कारण सूबे की जनता अब सरकार के प्रति न अच्छा न बुरा किसी भी स्थिति में बोलने को तैयार नहीं है। जनता समय का खामोशी से इंतजार कर रही है। किसान खफा है, व्यापाारी नाराज है, किसान असंतुष्ट है, शिक्षित युवा वर्ग निराश है,कर्मचारी बेलगाम और साधारणजन बेबस है। यह उपलब्धि है खट्टर सराकर के 1000 दिनों के कार्यकाल की। बाकी सब पाठक अनुमान लगा लेें।

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