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हरियाणा में बड़ा बिजली खेल? जनता की जेब पर डाका डालकर निजी कॉर्पोरेट को 1,300 करोड़ का गुपचुप भुगतान; ऊर्जा मंत्री अनिल विज भी अंधेरे में!
पूर्व मंत्री प्रो. संपत सिंह का सनसनीखेज खुलासा: सरकार खुद नहीं भरती 8,200 करोड़ का बिल, आम जनता से वसूल रही 'कैरींग कॉस्ट'
डिस्कॉम (Discoms) का घाटा ₹27,915 करोड़ पार; इनेलो की मांग—पूरे मामले की हो CAG जांच
चंडीगढ़ (15 मई):
हरियाणा की सियासत और बिजली महकमे में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के राष्ट्रीय संरक्षक और पूर्व भारी-भरकम मंत्री प्रो. संपत सिंह ने शुक्रवार को चंडीगढ़ स्थित पार्टी मुख्यालय में एक हाई-प्रोफाइल प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई। प्रो. सिंह ने सीधे और तथ्यात्मक दस्तावेज़ी सबूतों के साथ राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) और सरकार के गठजोड़ पर तीखा हमला बोला। उन्होंने दो टूक कहा कि बिजली कंपनियों द्वारा दायर की गई हालिया याचिकाएं कुछ और नहीं, बल्कि 'नौकरशाही दुस्साहस' (Bureaucratic Audacity) का एक शर्मनाक उदाहरण हैं, जिनका सीधा मकसद आम जनता की जेब काटना और चुनिंदा कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरी भरना है।
HERC की सुनवाई में मौन हुई वकीलों की फौज
प्रो. संपत सिंह ने बताया कि वीरवार (14 मई) को हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग (HERC) की अहम सुनवाई में बिजली कंपनियां (Discoms) अपने वकीलों की भारी-भरकम फौज लेकर पहुंची थीं। लेकिन जब हमारी तरफ से अकाट्य कानूनी तथ्य और आंकड़े रखे गए, तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। हमारी कानूनी दलीलों के आगे विपक्षी पूरी तरह मौन हो गया, जिसके चलते आयोग को मामले की गंभीरता देखते हुए अगली सुनवाई 10 जून, 2026 तक के लिए टालनी पड़ी।
मुख्यमंत्री और ऊर्जा मंत्री अनिल विज को 'अंधेरे' में रखकर 1,300 करोड़ का भुगतान!
प्रेस वार्ता में सबसे बड़ा बम फोड़ते हुए प्रो. सिंह ने कहा कि अक्टूबर 2025 में सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड (ग्रीनको) को 1,300 करोड़ रुपए का भुगतान जिस गोपनीय और संदिग्ध तत्परता के साथ किया गया, वह संस्थागत भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है। इस फाइल को इस तरह घुमाया गया कि न सिर्फ तत्कालीन मुख्यमंत्री, बल्कि खुद वर्तमान ऊर्जा मंत्री अनिल विज तक को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया। उन्होंने सवाल उठाया, "हरियाणा की जनता को यह जानने का पूरा हक है कि जब प्रदेश के 84 लाख परिवार सरकार द्वारा कानूनी रूप से मिलने वाली सब्सिडी का इंतजार कर रहे थे, तब 1,300 करोड़ रुपए चुपचाप एक निजी कॉर्पोरेट समूह के खातों में किस जादू से ट्रांसफर कर दिए गए?" उन्होंने इस पूरे मामले की स्वतंत्र उच्च-स्तरीय जांच की मांग की है।
उपभोक्ताओं के ₹2,263 करोड़ दबाकर बैठी हैं कंपनियां
आंकड़ों का जाल उजागर करते हुए पूर्व मंत्री ने कहा कि एक तरफ बिजली कंपनियां जनता से 'कैरींग कॉस्ट' (Carrying Cost) वसूलने के लिए पैर पटक रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्ष 2021 से उपभोक्ताओं के दबाकर रखे गए 2,263 करोड़ रुपए के नकारात्मक एफएसए (FSA) अधिशेष पर सांप सूंघ कर बैठी हैं। यह पैसा सीधा हरियाणा की जनता का है, जिसे तुरंत उपभोक्ताओं को लौटाया जाना चाहिए था, लेकिन कंपनियां इसे दबाकर बैठी हैं।
खुद का बिल बाकी, जनता पर चाबुक: ₹8,200 करोड़ का डिफॉल्टर है सरकारी सिस्टम
प्रो. सिंह ने विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 65 का हवाला देते हुए कहा कि नियम के मुताबिक सरकार को सब्सिडी का भुगतान एडवांस (अग्रिम) में करना होता है। इसके बावजूद हरियाणा सरकार ने ₹1,971 करोड़ की सब्सिडी जारी नहीं की। नतीजा यह हुआ कि कंपनियों को अपनी दैनिक नकदी जरूरतों के लिए महंगे कमर्शियल लोन (व्यावसायिक ऋण) लेने पड़े। इसके अलावा, सरकारी विभागों सहित करीब 22 लाख उपभोक्ताओं पर ₹8,200 करोड़ की भारी-भरकम बिजली बिल राशि बकाया है। विडंबना देखिए कि सरकार खुद अपने बिलों का भुगतान नहीं करती, लेकिन उसका खामियाजा आम घरेलू उपभोक्ताओं पर थोप देना चाहती है।
दिवालिया होने की कगार पर डिस्कॉम: ₹27,915 करोड़ का संचयी घाटा
आधिकारिक आंकड़ों को सामने रखते हुए प्रो. संपत सिंह ने खुलासा किया कि 31 मार्च 2026 तक बिजली कंपनियों का कुल बकाया कर्ज ₹22,132 करोड़ से अधिक हो चुका है। वहीं, 31 मार्च 2025 तक दोनों डिस्कॉम्स का संचयी घाटा (Cumulative Loss) ₹27,915 करोड़ रुपए था। उन्होंने साफ किया कि यह स्थिति किसी बाहरी संकट की वजह से नहीं, बल्कि बिजली महकमे में सुधारों में जानबूझकर की गई देरी और शीर्ष स्तर पर किए गए कुप्रबंधन (Mismanagement) का सीधा नतीजा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस महा-घोटाले की परतें नहीं खोली गईं, तो वे इस मामले की जांच नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) से कराने के लिए मजबूर होंगे।
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