“कब मिलेगी इनसे आजादी कब पूरे होंगे शहीदों के सपने”: आचार्य रमेश सचदेवा
अंग्रेज जो कानून, नियम, स्मारक या व्यवस्थाएँ निर्मित कर गए थे उनमें आज भी किसी तरह का बदलाव नहीं हुआ है। आज भी देश का हर विभाग, तंत्र यहाँ तक कि भारतीय सेना को जाति और प्रांत के नाम पर बाँटकर रखा हुआ है। पुलिस तंत्र भी अंग्रेजों के काल का ही है।
अंग्रेजों द्वारा थोपी गई प्रशासकीय प्रणाली जस की तस बनी हुई है। मैकाले की शिक्षा से कब मिलेगा छुटकारा? 78 वर्ष बाद हम पूछना चाहते हैं कि ब्रिटेन और भारत की संसद में क्या फर्क है? क्यों नहीं मुक्ति मिल सकती भाषा के आधार पर बाँटे गए प्रांतों से?
सबसे ज्यादा दुःख तो इस बात का है कि जिस भारत भूमि के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना सर्वस्व स्वाहा कर दिया था उस भूमि से हमने उसका हरापन छीन लिया। छीन लिया उसके साफ और स्वच्छ आसमान से ताजा पवन के झोंके को। विकास के नाम पर जल्दी से ऊपर जाने की लालसा के कारण हमने हमारे ही पशु—पक्षियों की अनेक प्रजातियों को मारकर उन्हें लुप्त प्राय: बना दिया। गौरय्या तो अब नजर नहीं आती।
जिस भूमि की सीमा की रक्षा के लिए लाखों शहीद हो गए, और विश्व के सबसे बड़े लोकतत्र के तगमें को पहने हुए हमारी संसद देखती रही उसे दुश्मन देशों के द्वारा हड़पते हुए ।
नदियों पर कई डेम बनाकर हमने उनके स्वाभाविक बहाव को रोककर उसकी प्राकृतिक संपदाओं
को नष्ट कर दिया है। अब दौड़ती नहीं नर्मदा, गंगा भी अब पूजा-पाठ और श्राद्धकर्म के नाम पर
दम तोड़ने लगी है। यमुना के तट पर वंशीवट के हाल बेहाल हैं। विकास के नाम पर पहाड़ों को भी
मैदान बना दिए जाने का दुष्चक्र जारी है। पिघलते हिमालय पर अब कोई साधु तपस्या के लिए
नहीं जाता। जंगलों को बगीचे जैसा व्यवस्थित बनाकर लाभ का जंगल बनाए जाने का प्रस्ताव
अभी विचाराधीन है।
ऐसे में यह सवाल हमारे अहिंसक मन को विचलित ही नहीं करता अपितु एक और सवाल पैदा करता है कि कब मिलेगी इनसे आज़ादी और कब पूरे होंगे शहीदों के सपने?
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