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खारे पानी की 'जहर' जमीन पर लिखा सफलता का नया अध्याय: रघुआना के गुरदीप ने झींगा पालन से खड़ा किया ₹65 लाख का 'ब्लू एंपायर'
बंजर खेतों की बदली तकदीर: जहां पारंपरिक फसलें तोड़ रही थीं दम, वहां वैज्ञानिक झींगा पालन (White Shrimp) से किसान ने रचा नया इतिहास।
₹14 लाख से ₹65 लाख का सफर: 2019 में 12 टन से शुरू हुआ उत्पादन, आज 21 टन वार्षिक तक पहुंचा; 25 परिवारों को दे रहे सीधा रोजगार।
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सरकारी योजनाओं का सटीक उपयोग: RKVY और PMMSY सब्सिडी के सहयोग से बंजर भू-भाग को बनाया सफेद सोने की खदान।
सिरसा । खारा पानी, सिकुड़ती सिंचाई व्यवस्था और हर साल फसलों का गिरता उत्पादन... सिरसा जिले के रघुआना गांव के किसान गुरदीप सिंह के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी थीं। आम किसान जहाँ बंजर होती जमीन और खारे पानी को किस्मत की मार मानकर हार मान लेते हैं, वहीं गुरदीप ने इसी 'खारे जहर' में 'सुनहरा भविष्य' तलाश लिया। उन्होंने अपनी बंजर जमीन को एक ऐसी प्रयोगशाला में बदला, जिसने आज उन्हें हरियाणा का अग्रिम 'झींगा किंग' (Shrimp Master) बना दिया है।
वर्ष 2019 में महज 14 लाख रुपये के शुरुआती निवेश से शुरू हुआ उनका यह साहसिक कदम, वित्त वर्ष 2023-24 तक आते-आते ₹65 लाख के सालाना टर्नओवर और ₹22 लाख के शुद्ध मुनाफे वाले एक सफल व्यावसायिक मॉडल में तब्दील हो चुका है।
==================================================================== गुरदीप सिंह के 'ब्लू रिवोल्यूशन' की सफलता का रिपोर्ट कार्ड
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• शुरुआती निवेश: ₹14 लाख (2019)
• वर्तमान सालाना कारोबार: ₹65 लाख (वित्त वर्ष 2023-24)
• सालाना शुद्ध मुनाफा: ₹22 लाख
• कुल झींगा उत्पादन: 12 टन (शुरुआत) ➔ 21 टन (वर्तमान)
• प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार: 25 लोग (10 प्रत्यक्ष + 15 अप्रत्यक्ष)
• सरकारी सब्सिडी प्रोत्साहन: ₹3.93 लाख (RKVY योजना)
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जोखिम से सफलता तक: तकनीक, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
पारंपरिक खेती में नुकसान झेल रहे गुरदीप सिंह ने कृषि मेलों, विशेषज्ञों और डिजिटल माध्यमों से खारे पानी में झींगा पालन (White Shrimp Farming) की जानकारी एकत्र की। जोखिम बड़ा था, लेकिन उन्होंने इसे वैज्ञानिक तरीके से लेने का फैसला किया।
उन्होंने मत्स्य विभाग से संपर्क किया और एक्वाकल्चर रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, हिसार से गहन तकनीकी प्रशिक्षण लिया। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के तहत 14 लाख रुपये की लागत से 1 हेक्टेयर में दो तालाब खोदकर सफर की शुरुआत हुई, जिसमें ₹3.93 लाख की सरकारी सब्सिडी मिली। सफलता की पहली लहर के बाद प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत दो और आधुनिक तालाब तैयार किए गए।
120-130 दिनों का 'साइंटिफिक कल्चर' चक्र
गुरदीप अपने फार्म पर झींगा पालन में कोई कोताही नहीं बरतते। वे प्रति वर्ग मीटर 25 से 32 झींगों की स्टॉकिंग डेंसिटी रखते हैं।
बायो-सिक्योरिटी (Bio-Security): तालाबों के पानी की लवणता (Salinity), PH मान और ऑक्सीजन स्तर की दैनिक डिजिटल निगरानी।
प्रोबायोटिक्स का प्रयोग: पानी को बैक्टीरिया-मुक्त रखने के लिए प्रोबायोटिक्स और उच्च गुणवत्ता वाले फीड का इस्तेमाल।
कल्चर अवधि: 120 से 130 दिनों में झींगा पूरी तरह बिकने के लिए तैयार हो जाता है।
खुद की तरक्की के साथ 25 परिवारों की आजीविका का बने सहारा
गुरदीप सिंह ने न केवल अपनी आय बढ़ाई, बल्कि स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा दी है। वर्तमान में उनके फार्म पर 10 लोगों को पक्का प्रत्यक्ष रोजगार और 15 लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है। शुरुआती दौर में आई बीमारियों और बाजार भाव के उतार-चढ़ाव को उन्होंने डायरेक्ट सेलिंग चैनल और बायोसिक्योरिटी के बूते मात दी।
एक्सपर्ट विजन: "खारे पानी वाले क्षेत्रों के लिए झींगा पालन वरदान"
जिला मत्स्य अधिकारी, सिरसा (जगदीश चन्द्र): "सिरसा और आसपास के जिन इलाकों में पानी खारा है और पारंपरिक फसलें पैदा नहीं होतीं, वहां झींगा पालन किसानों की किस्मत बदल सकता है। किसान अपनी जमीन और पानी की जांच करवाकर विभाग से तकनीकी व वित्तीय सहायता (subsidy) प्राप्त कर सकते हैं। गुरदीप सिंह अन्य किसानों के लिए एक रोल मॉडल हैं।"
आगे का विजन: कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और डायरेक्ट एक्सपोर्ट
गुरदीप अब अपने 'ब्लू एंपायर' का विस्तार करने में जुटे हैं। उनकी आगामी योजनाओं में शामिल हैं:
सिरसा में आधुनिक कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना।
झींगा बीज (Seed), उच्च गुणवत्ता फीड व दवाओं का अधिकृत वितरण केंद्र।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सीधा निर्यात (Direct Export) करने के लिए वैश्विक कंपनियों से टाई-अप।
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