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जीजेयू के प्रोफेसरों द्वारा फर्जी प्रदूषण प्रमाणपत्र जारी करने का मामला,चीफ सैक्ट्री से विजिलेंस जांच की पुनर्विचार की मांग

डबवाली न्यूज़ डेस्क 
गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय हिसार के प्रोफेसरों द्वारा औद्योगिक इकाईयों को जारी किए गए प्रदूषण प्रमाणपत्रों में भारी धांधली उजागर हुई। स्टेट विजिलेंस ने पूरे मामले का भंडाफोड़ किया। जांच अधिकारी द्वारा मामले में संलिप्त प्रोफेसरों के खिलाफ धोखाधड़ी, सरकारी धन के गबन सहित विभिन्न आरोपों के तहत मामला दर्ज करवाने की अनुशंसा की गई। लेकिन विजिलेंस विभाग के ही महानिदेशक ने इन अनुशंसाओं को दरकिनार कर केवल हरियाणा सिविल सेवाएं (दंड एवं अपील) 1987 के नियम-8 के तहत कार्रवाई करने का सुझाव दिया। नियम-8 को सरकारी सेवाओं में सबसे हल्की कार्रवाई समझा जाता है। मामले के पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा होने और औद्योगिक इकाईयों द्वारा प्रदूषण फैलाए जाने का होने की वजह से अग्रसेन कालोनी सिरसा निवासी व्हीस्ल ब्लोअर प्रो. करतार सिंह ने मुख्य सचिव से मामले पर पुनर्विचार की मांग की है। विजिलेंस विभाग के महानिदेशक के आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है कि आखिर विभाग के जांच अधिकारी द्वारा जो खामियां उजागर की गई है, उनकी अनुशंसा को क्यों दरकिनार कर दिया गया? वर्णनीय है कि गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय हिसार को हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पंचकूला से वर्ष 2005 से वर्ष 2014 की अवधि तक जल एवं वायु की जांच करने के लिए अधिकृत किया गया। विवि के प्रोफेसरों पर आधारित टीम ने विभिन्न औद्योगिक इकाईयों से जल व वायु के सैंपल लिए। नियमानुसार इन सैंपल की विवि की लैबोरेट्री में जांच की जानी थी और उनके ओर से दी गई रिपोर्ट को औद्योगिक इकाईयों को दिया जाता था। औद्योगिक इकाईयों द्वारा इस रिपोर्ट को हरियाणा राज्य प्रदूषण बोर्ड पंचकूला में जमा करवाया जाता था। इस प्रकार वे जल व वायु प्रदूषण का प्रमाणपत्र प्राप्त करते थे। जेजीयू हिसार के प्रो. नरेंद्र मलिक की ओर से मामले की श्किायत की गई कि औद्योगिक इकाईयों को जल एवं वायु प्रदूषण के सर्टिफिकेट जारी करने में बड़े स्तर पर धांधली की जा रही है। जिस पर विजिलेंस द्वारा जांच शुरू की गई। राज्य चौकसी ब्यूरो फतेहाबाद के निरीक्षक को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा गया। उनकी ओर से पूरे मामले की गहनता से जांच की गई और मामले में आरोपियों के बयान दर्ज किए। जल एवं वायु प्रदूषण की जांच के लिए खरीदे गए सामान के बिल व अन्य दस्तावेजों की भी जांच व पड़ताल की। जांच अधिकारी द्वारा अपनी रिपोर्ट में बताया कि टेस्ट के नाम पर केमिकल व अन्य सामान की खरीद के झूठे बिल बनाए गए। जब केमिकल खरीदा ही नहीं गया, तब जांच भी नहीं हुई। लेकिन औद्योगिक घरानों को रिपोर्ट जारी कर दीं।विजिलेंस विभाग के जांच अधिकारी द्वारा अपनी रिपोर्ट में बताया कि जीजेयू हिसार प्रो. नरसीराम बिश्नोई द्वारा 63 केमिकल की खरीद दर्शाई गई है, जिसमें से 59 केमिकल का जल व वायु प्रदूषण के कार्य के लिए इस्तेमाल ही नहीं किया जाता। इस प्रकार केमिकल खरीद के झूठे बिल प्रस्तुत किए गए है। इन केमिकल की खरीद पर 5.58 लाख की खरीद दिखाई गई। उनकी ओर से भादंसं की धारा 409, 420, 467, 468, 471, 120बी व पीसी एक्ट की धारा 13(1-डी) के तहत मामला दर्ज करने की अनुशंसा की गई। मामले में केमिकल का बिल जारी करने वाली फर्मों के संचालकों पर मामला दर्ज करने की अनुशंसा की गई थी।
60 फीसदी प्रोफेसरों और 40 फीसदी विवि का हिस्सा
वायु एवं जल प्रदूषण की जांच की एवज में औद्योगिक इकाईयों से वसूली जाने वाली राशि में से 60 प्रतिशत राशि जांच करने वाले प्रोफेसरों को दी जानी थी, जबकि 40 प्रतिशत हिस्सा जीजेयू का था। औद्योगिक इकाईयों से फीस के रूप में वसूली गई राशि विवि बिजनेस डिवलेपमेंट ग्रुप में जमा की जाती थी। बाद में इसी से प्रोफेसरों को और खरीदे गए केमिकल व अन्य सामान का भुगतान किया जाता था।
जांच से बाहर, फिर भी जारी की रिपोर्ट
 जीजेयू के प्रोफेसरों ने जल एवं वायु प्रदूषण की रिपोर्ट जारी करने में कितनी धांधली बरती, इसका खुलासा विजिलेंस द्वारा अपनी जांच में किया गया। बताया कि टीम ने आरसेनिक, मरकरी, सेलेनियम व बायोऐस के टेस्ट की रिपोर्ट भी जारी कर दी। जबकि विवि की लैब में इन टेस्ट करने की सुविधा ही नहीं थी। न ही प्रो. नरसीराम ऐसे टेस्ट करने के लिए अधिकृत थे। जांच रिपोर्ट में बताया कि प्रो. नरसीराम बिश्नोई ने जयभारत मारूति लि. गुडगांवा को जल में आरसेनिक सेलेनियम व मरकरी से संबंधित रिपोर्ट जारी की थी। उनकी ओर से बायोऐस का टेस्ट भी दर्शाया गया है, जिसके लिए मछली की आवश्यकता होती है। जबकि विभाग ने कभी मछली की खरीद ही नहीं की। इसी प्रकार मानेसर की मुंंजाल सोना लि. की आरसेनिक का टेस्ट दर्शाया है। औद्योगिक इकाइयों से 2 लाख 38 हजार 258 रुपये की वसूली करके विवि के खाते में जमा करवाए और इन फर्मों को लाभ पहुंचाने के लिए झूठी रिपोर्ट जारी की।
 शोधार्थियों के नाम से बनाया बिल
विजिलेंस द्वारा अपनी जांच रिपोर्ट में बताया कि जीजेयू के प्रो. चंद्रप्रकाश कौशिक की ओर से विभिन्न औद्योगिक इकाइयों के जल एवं वायु प्रदूषण की जांच की एवज में डेढ़ करोड़ रुपये की राशि विवि के बिजनेस डिवलेपमेंट ग्रुप में जमा करवाई गई और 74 लाख 44 हजार रुपये का स्टॉफ खर्च का बिल प्रस्तुत किया गया। जांच में पाया गया कि स्टॉफ में पीएचडी शोधार्थी सोमवीर व तीन अन्य को दर्शाया गया है। जबकि पीएचडी शोधार्थियों को विवि द्वारा 18 हजार रुपये मासिक छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है और शोधार्थी शोध कार्य के अलावा वैतिक अथवा अवैतिक कार्य नहीं कर सकता। इस प्रकार गलत बिल प्रस्तुत किए गए।
प्रदूषण से परेशान सिरसावासी
सिरसा में भी लोग विभिन्न औद्योगिक इकाईयों से परेशान है। इन औद्योगिक इकाईयों द्वारा न केवल जहरीला धुंआ उगला जाता है, बल्कि राख भी हवा में फैलाई जाती है। धूल और धुंए के कारण लोगों का सांस लेना भी दूभर हो जाता है। मगर, इन इकाईयों द्वारा अपने बचाव में हमेशा प्रदूषण प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर दिए जाते है। इस वजह से वे कार्यवाही से बच जाते है। जीजेयू का मामला उजागर होने के बाद इस आशय की आशंका बन गई है कि किस प्रकार औद्योगिक इकाईयों द्वारा प्रमाणपत्र हासिल किए जाते होंगे?

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