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डबवाली अग्निकांड: 30 साल बाद भी जलती यादें, न मिटा दर्द 23 दिसंबर 1995 — जब एक शहर रोता रह गया और देश स्तब्ध हो गया प्रत्यक्षदर्शी डॉ. सुखपाल सिंह की कलम से
23 दिसंबर…
एक ऐसा दिन जो सिख इतिहास में वीर बाल दिवस के रूप में साहिबजादों के अद्वितीय बलिदान की याद दिलाता है,
लेकिन डबवाली के लिए यही तारीख अथाह पीड़ा, अपूरणीय क्षति और आजीवन टीस का प्रतीक बन गई।
आज से ठीक 30 वर्ष पहले, 23 दिसंबर 1995 को हरियाणा के डबवाली शहर में घटा अग्निकांड न केवल भारत, बल्कि विश्व की सबसे भीषण अग्नि त्रासदियों में गिना जाता है।
राजीव मैरिज पैलेस में डीएवी स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम के दौरान लगी आग ने 442 मासूम जिंदगियों को पल भर में निगल लिया, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से झुलस गए—जिनमें से कई आज भी शारीरिक, मानसिक और आर्थिक पीड़ा के साथ जीवन जी रहे हैं।
वह पल, जो आज भी रूह कंपा देता है
इस त्रासदी का एक सजीव साक्षी मैं स्वयं भी हूं।
उस दिन मैं भी उसी कार्यक्रम में मौजूद था। नियति की कृपा कहें या ईश्वर की मर्जी—कार्यक्रम स्थल से आग लगने के मात्र 5–7 मिनट पहले मैं बाहर निकल आया था।
सड़क किनारे एक मूंगफली वाले से मूंगफली ले ही रहा था कि अचानक चीख-पुकार, धुआं और अफरा-तफरी ने सब कुछ बदल दिया।
कुछ ही क्षणों में आग ने विकराल रूप ले लिया।
जो दृश्य आंखों ने देखा, वह आज भी स्मृति में ताजा है—
मासूम बच्चों की चीखें, अपनों को ढूंढती मांओं की बेबसी और चारों ओर फैलता धुआं।
कई बार यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यदि मैं कुछ पल और अंदर रहता, तो शायद आज ये पंक्तियां लिखने वाला ही न होता।
वाहेगुरु की अपार कृपा से मैं बच गया, लेकिन सैकड़ों परिवारों के लिए वह दिन कभी खत्म नहीं हुआ।
कैसे फैली आग, क्यों बढ़ी तबाही
जांच रिपोर्टों और मीडिया दस्तावेजों के अनुसार, कार्यक्रम स्थल पर बिजली व्यवस्था में गंभीर लापरवाही बरती गई थी।
अस्थायी विद्युत कनेक्शन, शॉर्ट सर्किट, जेनरेटर का सही समय पर सक्रिय न होना और अत्यधिक ज्वलनशील सामग्री—
इन सबने मिलकर आग को कुछ ही मिनटों में जानलेवा बना दिया।
मुख्य लापरवाहियां सामने आईं—
आपातकालीन निकास के पर्याप्त रास्ते नहीं
अग्नि सुरक्षा उपकरणों का अभाव
पॉलिथीन शीट, बांस और कपड़े से बना पंडाल
ऊंची चारदीवारी और सीमित प्रवेश द्वार
कार्यक्रम के लिए कोई प्रभावी सुरक्षा ऑडिट नहीं
परिणामस्वरूप, आग से बचने का कोई रास्ता नहीं बचा।
संख्याएं नहीं, उजड़ते सपने थे
442 मृतक केवल आंकड़े नहीं थे—
उनमें बच्चे थे, माताएं थीं, शिक्षक थे, समाज के स्तंभ थे।
डबवाली का शायद ही कोई परिवार होगा, जो इस त्रासदी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित न हुआ हो। कई परिवारों ने एक साथ अपने दो-दो, तीन-तीन सदस्य खो दिए। सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो आज भी झुलसे शरीर, खराब होती आंखों, सांस की तकलीफ और मानसिक आघात के साथ जीवन जी रहे हैं।
न्याय की लंबी और थकाऊ लड़ाई
इस अग्निकांड के बाद पीड़ितों को न्याय दिलाने की लड़ाई वर्षों तक चली।कानूनी प्रक्रियाएं लंबी रहीं, फैसले देर से आए, लेकिन पीड़ितों ने हार नहीं मानी। लगभग दो दशक बाद मुआवजे और राहत से जुड़े कुछ निर्णय जरूर आए, लेकिन यह सच भी उतना ही कड़वा है कि कई जख्म ऐसे हैं, जिनकी भरपाई कभी संभव नहीं।
आज भी अधूरी हैं कई मांगें
तीन दशक बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवार आज भी कुछ बुनियादी मांगों के लिए आवाज उठा रहे हैं—
23 दिसंबर को राष्ट्रीय अग्नि सुरक्षा दिवस घोषित किया जाए
पीड़ितों के लिए स्थायी और प्रभावी पुनर्वास योजनाएं
सार्वजनिक स्थलों पर अग्नि सुरक्षा नियमों का सख्त पालन
स्कूलों, मैरिज पैलेसों और आयोजनों में नियमित सुरक्षा ऑडिट
यह केवल डबवाली की मांग नहीं, बल्कि पूरे देश की सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है।
एक सबक, जिसे भूलना नहीं चाहिए
डबवाली अग्निकांड हमें सिखाता है कि लापरवाही जब व्यवस्था बन जाए, तो त्रासदी निश्चित हो जाती है। श्रद्धांजलि केवल पुष्प अर्पित करने से पूरी नहीं होती, बल्कि तब होती है जब हम यह सुनिश्चित करें कि
ऐसी घटना फिर किसी शहर, किसी परिवार, किसी बच्चे के साथ न हो।
अंतिम अरदास और संकल्प
आज, इस काले अध्याय की 30वीं बरसी पर,
आइए उन सभी दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए वाहेगुरु से अरदास करें,और यह संकल्प लें कि हम सुरक्षा को औपचारिकता नहीं, बल्कि संस्कार बनाएंगे।
डबवाली की जली हुई राख से उठती यह आवाज आज भी हमें चेतावनी देती है—
“सावधान रहें… ताकि इतिहास फिर खुद को न दोहराए।”
लेखक:
डॉ. सुखपाल सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रत्यक्षदर्शी)
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